Category: संपादकीय

  • बैंकों के हजारों करोड़ दबाए बैठे लोग नहीं चाहते दबंग नौकरशाही

    बैंकों के हजारों करोड़ दबाए बैठे लोग नहीं चाहते दबंग नौकरशाही

    भोपाल,23 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटऱ)। बैंकों की रकम दबाकर बैठा मीडिया माफिया हो या जमीनों पर कब्जा जमाने वाला भू माफिया,आपराधिक वारदातों में संलग्न दबंग, सरकारी योजनाओं को गड़प जाने वाले राजनेता और ठेकेदार कोई नहीं चाहता कि उनके विरुद्ध लंबित शिकायतें सुनी जाएं और उनका निराकरण हो। यही वजह  है कि जब मुख्य सचिव अनुराग जैन ने कलेक्टरों, पुलिस अधीक्षकों और राजस्व अधिकारियों को शिकायतों का निराकरण करने की नसीहत दी तो माफिया ताकतों के टुकड़खोरों ने बात का बतंगड़ बना दिया। सहज संवाद की घटना को इस तरह प्रस्तुत किया गया मानों मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव कलेक्टरों को चोर कहना चाहते हैं। सरकार के मीडिया सलाहकारों ने इस मुद्दे पर खंडन जारी करवाकर तथ्य सामने रखे तो खबर का वैसा ही मंडन हो गया जैसा कि पहले से अपेक्षित था।

                   जनता के हित में उठी एक आवाज को कुचलने में जुटी माफिया ताकतें बार बार ये स्थापित करने का प्रयास कर रहीं हैं कि मानों सीएस ने नौकरशाही की मैली कुचैली तस्वीर को स्वीकार करके हथियार डाल दिए हों। कुछ नादान कलम घिस्सू ,जनहित की इस ललकार को  सीएस की चूक बताने में जुट गए हैं। शासन की ओर से कहा जा रहा है कि खबर को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है पर कोई मानने को राजी नहीं है। अब इसे अनपढ़ प्रदेश नहीं तो क्या कहा जाए जो जनहित में उठी आवाज के विरोध में अपनी खुशी तलाश रहा है। सभी जानते हैं कि शिवराज सिंह चौहान ने सुशासन के नाम पर लगभग दो दशकों तक जिस नौकर शाही को अपने सिर पर बिठाकर रखा वह आज बेलगाम हो चुकी है। कहीं राजनेताओं ने नौकरशाही को अपने दरवाजे बंधा कुत्ता बना दिया है कहीं संघ के नाम पर अफसरों के हाथ बांध दिए गए हैं। विपक्ष तो पहले से उन मुद्दों पर राजनीति करता रहा है जो समाज को सुधारने के बजाए बांटने का काम करते हैं।

                  कांग्रेस के नेता जीतू पटवारी ने सीएस की आवाज को मुख्यमंत्री और सरकार की असफलता दर्शाने के लिए प्रेस वार्ता तक बुला डाली। उनका कहना है कि सीएस ने जाने अनजाने में एक सच्चाई उजागर कर दी है। वे शासन के पक्ष पर गौर करने को राजी नहीं हैं कि मुख्य सचिव ने जो नहीं कहा उसे खबर बनाने की शैतानी कौन कर रहा है और क्यों कर रहा है। अखबारों की सुर्खियां बटोरने के लिए कांग्रेस के नेता इस गंभीर मुद्दे पर हंसी ठिठोली करने में जुट गए हैं। अन्य विपक्षी दलों की तो कोई आवाज ही नहीं है। उनका प्रदेश हित की  राजनीति से कोई वास्ता भी नहीं है। कांग्रेस के जो नेता राज्य में ठेकेदारी करके अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं वे भी नहीं चाहते कि नागरिकों की शिकायतों का निराकरण हो जाए । क्योंकि इससे सत्ता माफिया की जुगलबंदी की उनकी पोल भी खुल सकती है।  जो सत्ता माफिया कांग्रेस के शासनकाल में अपने डैने पसार चुका था वही आज अपने सहयोगियों के साथ भाजपा सरकार के सुशासन को पंगु बनाए हुए हैं। वह चाहता भी नहीं कि किसी तरह का सुशासन स्थापित हो।

               अटल बिहारी सुशासन संस्थान के जिन विशेषज्ञों ने बार बार सलाह देकर सरकारी तंत्र को जवाबदेह बनाने की सलाह दी वह भी इस घटना पर मुंह सिले हुए बैठे है। ये आनलाईन कांफ्रेंस पांच मुद्दों पर केन्द्रित थी। इनमें सुशासन, कानून व्यवस्था, कृषि,स्वास्थ्य और नगरीय प्रशासन जैसे जनहित से जुड़े विषय शामिल थे। जिन अतिक्रमण के मुद्दों पर जनता ने सीएम हेल्पलाईन पर शिकायतें की हैं उन्हें दबंगों ने अफसरों के सहारे पेंडिंग करवा दिया है। समय सीमा में निराकरण न होने की वजह से आम नागरिक परेशान हैं और बार बार कई स्तरों पर अपनी बातें उठाते रहते हैं। कानून व्यवस्था के मुद्दों को अपराधियों ने पुलिस प्रशासन से सांठ गांठ करके डंप करवा रखा है। कृषि विभाग का तो पूरा अमला नदारद है। खाद वितरण जैसे सरल विषय पर सरकारी अमले ने किसानों को धोबी का कुतका बना रखा है। स्वास्थ्य के लिए सरकारी अस्पतालों पर हजारों करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद जनता को निजी और कार्पोरेट अस्पतालों में लुटने को मजबूर होना पड़ रहा है। नगर पालिकाएं हों या नगर निगम सभी में अफसरों ने अपने कान और आंख बंद कर रखे हैं। वे सीएम हेल्पलाईन की शिकायतों को दबाव डालकर बंद करा देते हैं या एक दूसरे की ओर भेजकर टल्ले खिलाते रहते हैं।

            ऐसे हालात में यदि कोई मुख्य सचिव, अपने मातहतों को मुख्यमंत्री का भय दिखाकर लाईन पर लाना चाह रहा है तो मध्यप्रदेश का कथित मुख्यधारा का मीडिया इसे उपहास का विषय बनाने में जुट गया है। घरों में मां अपने बच्चों को पिता की नाराजगी का भय दिखाकर अच्छा नागरिक बनाने का प्रयास करती है। क्या इसे माता पिता के बीच दुश्मनी की तरह प्रस्तुत किया जाने लगेगा। राज्य का लगभग पैंतालीस फीसदी बजट खा जाने वाली नौकरशाही यदि जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरेगी तो निश्चित रूप से जन आक्रोश बढ़ेगा । जनता का असंतोष सरकार पर भी भारी पड़ेगा । सरकार और नौकरशाही के हित में यदि मुख्य सचिव उसे शिकायतों के निवारण की जिम्मेदारी पूरा करने की नसीहत दे रहे हैं तो वे कौन लोग हैं जो इसे आरोप प्रत्यारोप या विवाद का विषय बनाना चाहते हैं।

            सत्ता रूढ़ भाजपा को इस मुद्दे पर गंभीर रूप से चिंतन करना चाहिए। सरकार को असफल बनाने में जुटे माफिया को नसीहत देने के लिए सरकार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरह सख्त फैसले लेने होंगे। माफिया की कमर तोड़े बगैर यदि सरकार इस मुद्दे को दबाने का प्रयास करेगी तो आने वाला भविष्य भाजपा को एक असफल पार्टी के रूप में ही याद करेगा।

  • नीतिश के हिजाब उठाने पर हंगामा क्यों

    नीतिश के हिजाब उठाने पर हंगामा क्यों


    बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने जब यूनानी चिकित्सा की डॉक्टर नुसरत परवीन का हिजाब उठाकर उसकी आंखों की चमक देखने का प्रयास किया तो कट्टर पंथियोंऔर नीतिश विरोधियों ने अपनी ओछी राजनीति शुरु कर दी। इस घटनाक्रम को नीतिश विरोधियों ने महिला और इस्लाम का अपमान बताना शुरु कर दिया । इस शोरगुल से घबराई नुसरत अब सरकारी नौकरी ज्वाईन करने को तैयार हो गई है। नीतिश ने कभी नरक बन चुके बिहार को तेजी से विकसित और आत्मनिर्भर हो रहे प्रांत में बदलने का भगीरथ किया है। दंगे,लूट और अराजकता के दौर में जा चुके बिहार की गाड़ी को पटरी पर लाना कभी लगभग असंभव माना जाता रहा है। ऐसे में बिहार की तरुणाई की आंखों में विकास को लेकर जो संकल्प और दृढ़ विश्वास पनपा है वह अद्भुत है। युवाओं के मुस्कुराते चेहरे आज बिहार के नव सूर्योदय की झलक दिखाते हैं। कोई शिल्पकार अनगढ़ पत्थर को तराशकर उसमें मूर्ति का सौंदर्य उभारता है तो वह बार बार हर कोण से उसकी मुस्कान को उभारने का प्रयास करता है । नीतिश कुमार भी कुछ इसी तरह बिहार के नागरिकों के चेहरों पर मुस्कान लाने का प्रयास कर रहे हैं। उम्र के 74 वें पड़ाव पर वे आश्वस्त होना चाहते हैं कि बिहार के युवाओं की आंखों में आगे बढ़ने के कैसे स्वप्न पल रहे है।उनकी राजनीतिक पारी का लंबा इतिहास रहा है। उस यात्रा में नुसरत जैसी न जाने कितनी नारियां उनके साथ कदम मिलाकर चलती रहीं हैं। इतने लंबे इतिहास में कभी नीतिश कुमार को अय्याश या चरित्र हीन व्यक्ति नहीं माना गया है। वे एक संवेदनशील राजनेता हैं जो अपने राज्य की बेहतरी के लिए दुर्दांत माफिया से भी टकराता रहा है। बिहार के आपराधिक गिरोह जिस तरह संसाधनों को लूटते रहे हैं और वहां की तरुणाई मजबूर होकर अन्य राज्यों व दूर देशों में काम करने को मजबूर की जाती रही हो वहां एक युवती वो भी मुस्लिम समाज के बीच से निकलकर डाक्टर बनने जा रही हो ये सुखद आश्चर्य से कम नहीं है। उसकी आंखों की चमक देखने का प्रयास करने वाले नीतिश कुमार अकेले व्यक्ति नहीं हैं । जिन चयनकर्ताओं ने उसे एक बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी के लिए चुना वे भी उसकी योग्यता और सामाजिक समर्पण के कायल थे तभी तो उन्होंने उसे नौकरी के लिए चुना। ये नियुक्ति नीतिश कुमार के निर्देश पर नहीं हुई थी। जाहिर है कि उस क्षण को जिसे नीतिश कुमार भाव विभोर होकर देखने का प्रयास कर रहे थे उसे पूरी दुनिया में रह रहे बिहारी भी प्रसन्न भाव से देख रहे हैं। केवल कुछ कट्टरपंथी और विरोधी इस पर बखेड़ा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। जिन्होंने इतिहास पढ़ा है उन्होंने अंग्रेजों, मुगलों, जमींदारों, छुटभैये राजाओं की वे कहानियां खूब पढ़ी हैं जिनमें वे राज्य की नवयुवतियों को अपनी सेज पर ले जाने का कुकर्म करते देखे गए थे। इन्हीं बैचैनियों से निकलकर लोकतांत्रिक व्यवस्था ने जन्म लिया। आज कोई भी शासक या राजा ऐसी जुर्रत भी नहीं कर सकता है। नुसरत की उम्र तो उनके नाती पोतियों के बराबर है।वे सार्वजनिक स्थल पर उसके साथ अश्लील व्यवहार करने की सोच भी कैसे सकते हैं। वे जिस प्रशंसा भरे भाव से नुसरत को देख रहे थे वह दृश्य न केवल बिहार की आगे बढ़ती एक लड़की की कहानी सुनाता है बल्कि भारत के मुसलमानों की आगे बढ़ती नई पीढ़ी का दृष्टांत भी देता है। मुस्लिम वोटरों के जो ठेकेदार बरसों से भाजपा और उसके सहयोगी गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों को मुस्लिम विरोधी बताते रहे हैं वे इस घटनाक्रम से जरूर बैचेन घूम रहे हैं। उन्हें भय है कि यदि भारत के मुसलमानों की नई पीढ़ी के बीच से हिंदुत्व वादी राजनीति को मुस्लिम विरोधी बताने वाला नेरेटिव टूट गया तो वे कभी सत्ता का ख्वाब भी नहीं देख पाएंगे। जिस तरह हिंदू मुस्लिम और जातिगत व भाषाई राजनीति करके उन्होंने भारतीय समाज में फूट के बीज बोए थे वह षड़यंत्र धराशायी हो जाएगा। इसीलिए वे तरह तरह के दुष्प्रचार करके समाज को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं। ये अच्छा है कि नुसरत ने उनके बहकावे में न आकर अपने पैरों पर खड़े होकर चिकित्सा के माध्यम से समाजसेवा का निर्णय लिया है वह प्रशंसनीय है और स्वागत करने योग्य है। नुसरत के समान देश के सभी युवाओं को संकरे पैमानों से बाहर आकर विकास यात्रा का सहयात्री बनना है,तभी हम एक नए भारत का स्वप्न साकार कर पाएंगे।

  • सबके विकास के दौर में बार बार कुचली जाएगी धर्मांधता

    सबके विकास के दौर में बार बार कुचली जाएगी धर्मांधता


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हिंदुस्तान सबके विकास का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ता जा रहा है। इसके लिए सबको समान अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। विकास योजनाओं का लाभ भी सबको समान रूप से दिया जा रहा है। इसके बावजूद चंद कट्टरपंथी ताकतें अपना धर्म सबसे अव्वल वाली विचारधारा की ध्वज वाहक बनी हुई हैं। ये ताकतें न केवल मुस्लिम बल्कि सभी धर्मों में मौजूद हैं। दरअसल धर्म की आस्थावान सोच को लोग वैज्ञानिक आधार पर नहीं बल्कि पाखंडों के आधार पर विकसित करने का प्रयास करते हैं इसलिए उन्हें झूठे मुद्दों पर भीड़ जुटानी पड़ती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जिस एकात्मकता को अपनी कार्यशैली बनाया है उसके बीच किसी भी कट्टरता को स्थान मिलना संभव नहीं है। फूट डालो राज करो वाली अंग्रेज परस्त कांग्रेस की राजनीति इसके सामने विदा होती चली जा रही है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद जिस तरह आपरेशन सिंदूर के अंतर्गत पाकिस्तान की कुटाई की गई उसे देखकर इन कट्टरपंथी ताकतों को समझ लेना चाहिए कि उनकी वैमनस्य भरी राजनीति का अंत अब निकट आ गया है।


    सदियों से युद्ध वास्तव में किसी भी समाज की गंदगी साफ करने का प्रमुख अस्त्र साबित होता रहा है।इससे जहां लोगों में सामाजिक उद्देश्यों के प्रति जागरूकता बढ़ती है वहीं एकात्मकता का भाव भी विकसित होता है।कट्टरपंथी इस्लाम वादियों ने कथित भाईचारे के नाम पर एकात्मकता विकसित करने का फार्मूला अपना रखा है। ये भाईचारा मुस्लिम मुस्लिम भाई भाई तो कहता है लेकिन गैर मुस्लिम को काफिर कहकर लूटने और काटने की सलाह भी देता है। औपनिवेशिक दौर में भले ही ये चलता रहा हो। इसे सामाजिक स्वीकार्यता मिलती रही हो लेकिन पूंजीवाद के इस दौर में इस विकास विरोधी विचार के लिए कोई जगह नहीं है। जो लोग पूंजीवाद को कोसते फिरते हैं उन्हें भी अंततः पूंजीवाद की ठकुर सुहाती ही करनी पड़ती है।

    दरअसल पूंजीवाद और शोषणवाद दो अलग अलग विचार हैं। पूंजीवाद कहीं नहीं कहता कि श्रमिकों का शोषण किया जाए। ये तो वही अक्षम लोग हैं जो पूंजी पाकर शोषण पर उतारू हो जाते हैं।कई बार ऐसे लोगों का इलाज कानून से नहीं अपराध से ही करना पड़ता है। अमेरिका का पूंजीवादी समाज अपराध की वाशिंग मशीन में ही डालकर झकास साफ निखार पाता है। इसलिए दक्षिण एशिया में धर्म की ध्वजा थामने वालों को भी जान लेना होगा धर्म की आड़ में शोषणवादी ताकतों को संरक्षण देने की उनकी प्रवृत्ति अंततः कुचल ही दी जाएगी। चाहे पाकिस्तान हो या फिर हिंदुस्तान कहीं भी आतंक के अड्डों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। जो लोग सोचते हैं कि इस्लामिक आतंकवाद से निपटने के लिए हमें हिंदू आतंकवाद को खड़ा करना होगा वे निहायत ही नादानी की बात करते हैं। आतंकवाद हमेशा ही विकास विरोधी होता है फिर वह किसी भी धर्म की आड़ लेकर क्यों न खड़ा किया जा रहा हो। पाकिस्तान के जो शासक ये बोलते हैं कि हम भी आतंकवाद का शिकार रहे हैं ये बोलकर वे दरअसल खुद की अक्षमता का ही उद्घोष कर रहे हैं। देश में नरेन्द्र मोदी हों या फिर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ इन्होंने कहीं भी धर्म के नाम पर गुंडागर्दी को बढ़ावा नहीं दिया है। यही तो वह सकारात्मक विचार है जो देश को पांच ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य से आगे लेकर बढ़ता जा रहा है। पाकिस्तान के शासक क्या सोचते हैं ये उनकी समस्या है लेकिन उनकी समस्या यदि भारत को परेशान करेगी तो भारत की मजबूरी होगी कि वह सीमापार जाकर उन फोडों का इलाज करे। इसे यदि पाकिस्तान खुद पर हमला बताता है तो इस पर यकीन करना उसकी आवाम और वहां के शासकों की मूर्खता भरी सोच ही कही जाएगी।चीन जैसे देशों को भी समझना होगा कि वह भारत के प्रति वैमनस्यता रखकर यदि पाकिस्तान के आतंकवाद के साथ खड़ा होता है तो वह खुद के लिए एक नई कब्र खोद रहा है।

    तीन दिन के युद्ध में आपरेशन सिंदूर ने ये बता दिया है कि भारत, पाकिस्तान, बंग्लादेश और बंगाल के मुसलमानों को भी साफ समझ लें कि वे कट्टरपंथी ताकतों के भ्रमजाल में न उलझें। मोदी सरकार की नीति उनके विरुद्ध नहीं है। उन्हें उनकी धार्मिक सोच के साथ जीने की पूरी आजादी है। वे अपना जीवन संवारें इससे किसी को आपत्ति नहीं है। इसके विपरीत यदि वे चाहते हैं कि हम आतंकवाद के सहारे धर्मांतरण करेंगे और गजवा ए हिंद के मूर्खता पूर्ण सोच को लागू करने की कवायद में लगे रहेंगे तो फिर उनकी ये जिद अवश्य ही कुचली जाएगी। भारत के हिंदु हों या यहां के मुसलमान उन्हें कट्टरता की पट्टी पढ़ाकर उनका जीवन नहीं संवारा जा सकता। हां विकास की राह प्रशस्त करके जरूर उनका जीवन सुखमय बनाया जा सकता है। फिर वे चाहे तो हिंदु बनकर रहें या मुस्लिम बनकर किसी को क्या फर्क पड़ता है।

  • संविधान को जनता का रोड़ा बनाने वालों को दंडित कौन करेगा

    संविधान को जनता का रोड़ा बनाने वालों को दंडित कौन करेगा


    संविधान दिवस पर देश में खूब चर्चाएं हो रहीं हैं। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के अभिभाषण पर विपक्ष के कई नेता उछल पड़े हैं। समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों के तिरोहित होने की संभावना पर वे बौखलाए घूम रहे हैं.कांग्रेस के नेता गण सवाल उठा रहे हैं कि क्या देश के आम नागरिकों को न्याय और स्वतंत्रता मिल पा रही है। यदि नहीं तो संविधान के आगे झुकने से क्या होने वाला है। संविधान दिवस मनाकर सरकार आम नागरिकों के दिलों में दायित्वबोध जगाने का प्रयास कर रही है। विपक्ष सरकार के कार्य को कटघरे में खड़ा कर रहा है । ये वही विपक्ष है जिसने लगभग सात दशकों तक देश पर शासन किया है। इसके बावजूद संविधान की उपयोगिता पर वह आज सवाल उठा रहा है। संविधान को अपना उल्लू सीधा करने का उपकरण बनाकर एक बड़े वर्ग ने इसे विकास की राह में सबसे बड़ा अडंगा बनाकर रख दिया है। उन लोगों का प्रयास रहता है कि वह अपने गैरकानूनी कार्यों को संविधान सम्मत बताने के लिए तरह तरह के शिगूफे छोड़ें और संविधान की इबारतों का उल्लेख करके सब तक न्याय और विकास का लाभ न पहुंचने दें।देश में कभी राजतंत्र और जमींदारी प्रथा शोषण का माध्यम बनी हुई थी। तब भी मलाईदार तबका विकास का लाभ सभी तक नहीं पहुंचने देता था। आज लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी कमोबेश वही हालात बने हुए हैं। जिन्हें लोकतंत्र का लाभ मिल रहा है वे दूसरों से इसकी सहभागिता की राह में रोड़ा बन गए हैं। अफसरशाही इस शोषण कारी व्यवस्था की सबसे बड़ी खलनायक बनकर उभरी है। देश और राज्य के संसाधनों का लगभग अस्सी फीसदी हिस्सा गड़प कर जाने वाली नौकरशाही लोकतंत्र में जनता की सहभागिता रोकने में जुटी हुई है। नौकरशाही अपने दायित्व का निर्वहन तो करती नहीं और यदि कोई व्यक्ति या संस्था जनसहभागिता के आधार पर कोई प्रयास करता है तो उसमें अडंगा जरूर लगा देती है। जिस सहकारिता को जनता के विकास की सीढ़ी माना जाता रहा है उसमें भी लोकसेवक ही प्रावधानों की परिभाषा को तोड़ मरोड़कर अडंगा लगाकर खड़े हो जाते हैं।यदि कोई व्यक्ति सहकार भाव से संस्था बनाने पहुंचे तो तरह तरह के कुतर्क देकर यहां के अफसर ही अडंगा लगान लगते है। जिस सहकारिता को जन भागीदारी का ढांचा समझा जाता है उसमें भी नियम कानूनों का जाल बिछाकर वे सहकारी आंदोलन में पलीता लगा देते हैं। यही वजह है कि आज तक देश में सहकारिता आंदोलन का प्रसार नहीं हो पाया है। भारत में एक भी सार्वजनिक या निजी बैंक नहीं डूबा है ,लेकिन जितने भी बैंक डूबे हैं वे सभी सहकारी हैं। यदि नियम कानूनों का पुख्ता जाल मौजूद है तो फिर क्यों सहकारी संस्थाएं धराशायी हो जाती हैं।आडिट की पुख्ता दीवार होने के बावजूद माफिया ताकतें कैसे जन धन को गड़प करने में सफल हो जाती हैं। इस बात पर कानून का पुलिंदा लेकर चलने वाले अफसर मौन हो जाते हैं। निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठान हों या कार्पोरेट क्षेत्र की कंपनियां , वे सभी अपने टारगेट पा लेते हैं लेकिन सहकारी संस्थाएं ढप हो जाती हैं। जब तक कोई सख्त प्रशासक बदमाशों से पंगा लेकर सहकारी संस्था को संभाले रहता है तब तक तो वह संस्था चलती रहती है जैसे ही वह हटता है उसके सहयोगी ही संस्था को खा जाते हैं। प्रशासनिक तंत्र में मौजूद अफसर भी संविधान की दुहाई देकर जनता को इधर उधर दौडाते रहते हैं। जब अतिक्रमण और स्वामित्व को लेकर संवैधानिक प्रावधान मौजूद हैं तो फिर राजस्व विभाग के अफसर अपना दायित्व निर्वहन न करके लोगों को अदालतों की ओर क्यों ठेल देते हैं। यदि हर समस्या का समाधान अदालती फीस चुकाकर ही प्राप्त करना है तो फिर इस अफसरशाही की जरूरत ही क्या है। राज्य के मुख्य सचिव अनुराग जैन कहते हैं कि यदि जिलों की समस्याएं राज्य स्तर तक पहुंची उनके समाधान नहीं किए गए तो अफसरों पर कार्रवाई की जाएगी। समस्या तो ये है कि कार्रवाई करेगा कौन। यदि अकुशल अफसरों को दंड दिया जाए तो अदालतें उन्हें राहत देने सामने आ जाती हैं। विधायिका में बैठे गैर जिम्मेदार नेतागण इस कार्रवाई में अडंगा बनकर सामने आ जाते हैं.। कर्मचारी संगठन मिलकर उस भ्रष्ट या अकुशल कर्मचारी को बचाने लगते हैं। इसके विपरीत यदि कोई अफसर अपने दायित्व का निर्वहन ठीक तरह से करे तो उसे तरह तरह के फर्जी मामलों में फंसाकर दंडित किया जाता है। तब भी इसी संविधान को हथियार बनाकर इस्तेमाल किया जाता है। हमें सोचना होगा कि हम संविधान बचाने के लिए जी रहे हैं या फिर संविधान को हमें लोक कल्याण के लिए उपयोग करना है। यदि कोई व्यक्ति किसी निर्धारित फार्मेट में अपनी पीड़ा प्रस्तुत नहीं करता है या फिर वह किसी सामाजिक दवाब में पीछे हटने को मजबूर है तो क्या ये जवाबदारी लोकसेवकों की नहीं है कि वे समस्या का समाधान करने की पहल स्वयं करें। यदि कोई अकुशल नागरिक मिलकर सहकारिता के माध्यम से पूंजी उत्पादन करना चाहते हैं तो अफसरशाही उनका मार्गदर्शन करे और देश के लिए पूंजी निर्माण की राह प्रशस्त करे। समाजवाद के नारे लगाना हो या धर्मनिरपेक्षता की लोरियां सुनाना इन सबके बीच क्या हम आम नागरिक की पीड़ा को अनसुना करते रहेंगे। आखिर हम किस समाजवाद की बात कर रहे हैं। क्या इंसानियत का धर्म किसी भी पाखंडी धर्म के सामने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाएगा। जिस तरह मुगल शासक अपनी अय्याशी की वजह से भुला दिए गए। अंग्रेज अपनी दमनकारी नीतियों की वजह से भगा दिए गए। जमींदार अपनी शोषण कारी नीतियों की वजह से विदा कर दिए गए। उसी तरह ये लोकतंत्र भी अपनी गैर जिम्मेदारी और पाखंडी लोकसेवा के कारण जल्दी ही विदा कर दिया जाएगा। प्रशासनिक नाकामियों की इसी वजह से आज देश में कार्पोरेट सेक्टर का बड़ा तंत्र खड़ा हो चुका है। सरकारी क्षेत्र तो अब केवल लोकतंत्र के नाम पर कचरा ढोने वाली व्यवस्था बनकर रह गई है। यदि अफसरशाही ने अब भी अपने गिरेबान में नहीं झांका। नेता नगरी ने रिश्वत देकर सत्ता पाने की अपनी नीति जारी रखी तो जाहिर है कि लोग अपनी राह खुद तलाश लेंगे। जिस लोकतंत्र को आज सर्वश्रेष्ठ शासनशैली माना जाता है वह देखते ही देखते अजायबघर की वस्तु बनकर रह जाएगी। इसके लिए गैर जिम्मेदार अफसरों को सख्ती से विदा करना होगा और तंत्र से बाहर करना होगा तभी लोकतंत्र की भावना को बचाया जा सकता है। शायद संविधान दिवस मनाने का आशय भी यही है।

  • भाजपा का जादूगर कौन बनेगा

    भाजपा का जादूगर कौन बनेगा


    देश भर में भाजपा के प्रति वोटर की नाराजगी बढ़ती जा रही है।भाजपा का कोर वोटर तक असमंजस में है। इसकी वजह किसी अन्य दल की लोकप्रियता नहीं बल्कि भाजपा की वे नीतियां हैं जिनकी वजह से जनता का जीवन दूभर होता जा रहा है। वैश्विक उथलपुथल ने वैसे भी भारत के बाजार को झकझोर रखा है ऐसे में भाजपा की सरकारें दाता कहलाए जाने के लिए खुद को गोली बिस्कुट बांटने वाली भूमिका से बाहर नहीं निकाल पा रहीं हैं। बढ़ती आबादी पर हायतौबा मचाने वाले देश के बुद्धिजीवियों को जरा भी भान नहीं है कि वे जनता के बीच से नया नेतृत्व न उभरने देकर आम लोगों को कैसे कैसे दलदल में धकेल रहे हैं। भारत आज लगभग एक सौ चालीस करोड़ की आबादी वाला देश है। सबसे ज्यादा युवा आबादी भी भारत के पास है। इसके बावजूद यहां की सरकारें आज भी इनाम बांटकर सलामी बटोरने की सोच से नहीं उबर पाईं हैं। मध्यप्रदेश की मोहन यादव सरकार अन्य राज्यों में घटते जनाधार से कुछ ज्यादा ही चिंतित नजर आ रही है। यही वजह है कि सरकार ने आदिवासी बहुल सिंग्रामपुर पहुंचकर रानी दुर्गावती के साए में अपना दरबार सजाया। सरकार ये संदेश देने का प्रयास कर रही है कि वह आदिवासियों की अपनी सरकार है । रानी दुर्गावती ने जिस तरह अपने आदिवासियों की रक्षा के लिए विदेशी आक्रांताओं से मुकाबला किया उसी तरह भाजपा की सरकार भी उनकी रक्षक है। संदेश देने का ये उपाय तो ठीक है लेकिन इसकी जड़ में जो तथ्य सामने आए हैं वे जरूर चिंतित करते हैं। गोंडवाना साम्राज्य की यादें लेकर चलने वाले आदिवासियों के बीच भाजपा आज भी पूरी तरह से घुल मिल नहीं पाई है। इसकी वजह ये है कि उसके पास कुशल आदिवासी नेतृत्व नहीं है। सांसद से विधायक और मंत्री बने प्रहलाद पटेल की पहल पर आयोजित इस कैबिनेट बैठक ने एक तीर से कई निशाने साधने का प्रयास किया है। सिंग्रामपुर की भौगौलिक स्थिति जबलपुर और दमोह के लगभग बीच में है।तीसरी ओर नरसिंहपुर का क्षेत्र भी यहीं से जुड़ता है। तीन संसदीय सीटों के बीच का ये इलाका आदिवासी बहुल है। यहां के आदिवासी आज भी कठिन जीवनशैली के बीच गुजर बसर करते हैं। दमोह से जबलपुर को जोड़ने वाला राजमार्ग अब तक केवल इसलिए उखड़ा पड़ा है क्योंकि सरकार के पास पर्याप्त वित्तीय साधन नहीं है। सरकार ने इस राजमार्ग के राष्ट्रीयकरण के लिए केन्द्र के पास प्रस्ताव भेज रखा है। प्रहलाद पटेल को उम्मीद है कि केन्द्र से ये राष्ट्रीय राजमार्ग मंजूर हो जाएगा तो जल्दी ही इसकी व्यापक मरम्मत हो जाएगी। पाहुनों से सांप मरवाने की इसी सोच के चलते राज्य की आत्मनिर्भरता आज तक लड़खड़ा रही है। सरकार ने जितने व्यापक प्रबंध करके सिग्रामपुर में कैबिनेट की बैठक आयोजित की लगभग उतने ही वित्तीय संसाधनों से तो इस राजमार्ग की मरम्मत भी हो सकती थी। लगभग पूरी सरकार भोपाल से जबलपुर पहुंची वहां होटलों में विश्राम किया और सुबह तैयार होकर कारों बसों से सिग्रामपुर पहुंची। इधर सागर दमोह के मार्ग से भी कई गाड़ियां कैबिनेट स्थल तक पहुंची। यहां आयोजित आमसभा के लिए लगभग एक हजार गाड़ियों का प्रबंध किया गया था। हालांकि लगभग तीन सौ बसों में भरकर पहुंची लाड़ली बहनाओं के आने जाने और खाने का प्रबंध भी किया गया। आयोजन का प्रचार प्रसार ठीक तरह हो सके इसके लिए लगभग सौ गाड़ियों में भरकर पत्रकारों को भी सिग्रामपुर पहुंचाया गया। शानदार पंडाल लगाए गए और भारी पुलिस सुरक्षा के प्रबंध भी किए गए। इस वीरांगना रानी दुर्गावती टाईगर रिजर्व का वन अमला भी सेवा में मौजूद था। कैबिनेट के मंत्रियों को यहां पहुंचाकर सरकार ने अपने उन फैसलों की घोषणा की जो शायद वह भोपाल में बैठकर चुटकियों में कर सकती थी। सरकार ने भोपाल में लगभग एक हजार करोड़ रुपयों की लागत से विशाल मंत्रालय बनाया है। जिसमें तमाम सुविधाएं मौजूद हैं लेकिन इसके बावजूद डरी सहमी सरकार इस आदिवासी अंचल में घुटना टेकने जा पहुंची। यहां के जन मानस में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसी अपनी राजनीतिक सोच का वजूद तो है ही लेकिन इसके साथ साथ कांग्रेस के रत्नेश सालोमन की लोकप्रियता आज भी बरकरार है। रत्नेश सालोमन जिंदादिल तबियत के राजनेता थे। उन्होंने इस टाईगर रिजर्व को चमकाने में बड़ी भूमिका निभाई थी।यहां उन्होंने फारेस्ट गेस्ट हाऊस बनवाया था जहां वे अक्सर अपनी मंडली के साथ मौजूद रहते थे। आदिवासियों का मेला वहीं जमा रहता था। खुले दिल से आदिवासियों की मदद करने का उनका स्वभाव और घुलमिलकर रहने वाली जीवनशैली की वजह से कांग्रेस इस क्षेत्र में अपने पैर जमाए रहती थी। आज उन्हें गए लंबा अरसा हो गया है लेकिन लोगों के मन में उनकी छवि पहले की तरह मौजूद है। ऐसे में भाजपा के आदिवासी नेता हमेशा घबराए रहते हैं। कुंवर विजय शाह जरूर इस बैठक में पहुंचकर उम्मीद कर रहे थे कि उन्हें पर्याप्त महत्व मिलेगा लेकिन प्रहलाद पटेल की मंडली ने उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं दी। नए मुख्य सचिव अनुराग जैन और शासन के सभी आला अधिकारियों ने सरकार की सोच से कदमताल मिलाते हुए जनोन्मुखी प्रशासन देने के तमाम प्रयास किए । दमोह कलेक्टर सुधीर कुमार कोचर तो लगभग दस दिनों से इस आयोजन को सफल बनाने के लिए रात दिन एक किए हुए थे। वे स्थानीय जनप्रतिनिधियों जयंत मलैया जी, पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल, रामकृष्ण कुसमरिया,धर्मेन्द्र लोधी, लखन पटेल आदि को ले जाकर आयोजन की रूपरेखा बनाते रहे। इतने विशाल आयोजन के लिए कई दिनों से दमोह की प्रशासनिक व्यवस्था पर भी तनाव बना हुआ था। जाहिर है कि सरकार को अपनी कार्यशैली पर एक बार फिर विचार करना चाहिए ताकि आने वाले समय में एक परिणाम मूलक सरकार मध्यप्रदेश के विकास को नई ऊंचाईयां दे सके। जब छोटे छोटे देश विकास के नए पैमाने गढ़ रहे हैं तब मध्यप्रदेश भाजपा के नेता खुद को कांग्रेस की बी टीम से ज्यादा आगे नहीं देख पा रही है। पिछले बीस सालों में शिवराज सिंह चौहान सरकार तो कांग्रेस बनकर ही कार्य करती रही। यही वजह थी कि एक बार सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा और आज भी वह कांग्रेस का जनाधार समाप्त नहीं कर पाई है। जनता ने कांग्रेस की नीतियों से असहमति जताकर भाजपा को सत्ता में भले भेज दिया हो लेकिन वह उससे कुछ अलग नतीजों की आस लगाए बैठी है। भाजपा के नेताओं को जनमन के झुरमुट से झांकती इस रोशनी को पढ़ने की कला विकसित करनी होगी तभी वह एक सफल सरकार वाला सफल प्रदेश गढ़ पाएगी।ध्यान रहे जनता को नाक रगड़ने वाली भाजपा नहीं अपना भविष्य सुरक्षित करने वाली सरकार की जरूरत है।

  • इस लोकतंत्र को रीसेट होने दीजिए

    इस लोकतंत्र को रीसेट होने दीजिए


    आजादी का पर्व नजदीक है। भारतीय लोकतंत्र और स्वाधीनता को लेकर राग जयजयवंती गाने वालों की टोलियां बाजार में निकलने वाली हैं। जिसने भी लाभ की मिठाई पा ली वह इस लोकतंत्र की का गुणगान करने लग जाएगा। जो वंचित रहा निश्चित तौर पर वह गाली देगा। दरअसल हम सोचने को राजी नहीं कि लोकतंत्र और आजादी के उल्लास में हमने क्या गंवा दिया है।हमें सोचना होगा कि आखिर भारत की तरुणाई को लगभग आधी सदी तक किन्होंने तरह तरह के षड़यंत्रों में फंसाकर रखा । भारत में किसी प्रतिष्ठान को चलाना कितना दुरूह कार्य है ये मध्यप्रदेश सैडमैप के प्रयासों को देखकर समझा जा सकता है। मध्यप्रदेश सरकार ने ये संस्थान इसलिए बनाया था ताकि इसके माध्यम से प्रदेश के गौरवशाली प्रतिष्ठानों के लिए अच्छी गुणवत्ता का प्रशिक्षित मानव बल तैयार किया जा सके। डिग्रियां लेकर तो हर साल युवाओं की बड़ी वर्कफोर्स तैयार हो रही है। उनमें से नतीजे देने वाले युवाओं की तलाश भूसे में सुई तलाशने जैसी होती है। यही सोचकर सरकार ने एक गुणवत्ता पूर्ण संस्था के माध्यम से वर्कफोर्स उपलब्ध कराने का इंतजाम किया था। अब तक की यात्रा में सैडमैप ने प्रदेश के विकास में बड़ी भूमिका निभाई है। सरकारी संरक्षण होने की वजह से इस संस्थान को अधिक अवसर उपलब्ध हो जाते हैं। संस्थान सरकारी नहीं है और एक तरह से निजी संस्था है इसलिए इसमें वैयक्तिक लाभ लेने के भी अवसर उपलब्ध हो जाते हैं। केवल नैतिकता की झीनी चंदरिया ही सामाजिक दायित्वों की रक्षा कर पाती है। सैडमैप की कार्यकारी संचालक अनुराधा सिंघई के पहले तक जिन लोगों ने जवाबदारियां संभालीं उनमें से कई पर आरोप लगे। जांच एजेंसियों ने उनके घरों पर छापे भी मारे और कई गड़बड़ियां भी पाईं । यही वजह है कि अब कोई भी यहां नवाचार करने का प्रयास करता है उसे भी संदेह की निगाह से देखा जाने लगता है। मध्यप्रदेश शासन ने अनुराधा सिंघई को उनकी विश्वस्तरीय योग्यताओं को देखते हुए संस्थान संभालने की जवाबदारी दी है। उन्होंने जब यहां चल रहे नाकारेपन की गंदगी को साफ करना शुरु किया तो यहां अड्डा जमाए बैठी तरह तरह की माफिया ताकतों ने हल्ला मचाना शुरु कर दिया।अब तक इस संस्थान को लेकर भी उनकी उपलब्धियों पर चर्चा कम हुई अखबारी सुर्खियां बने फड़तूस बयानों को चटखारे लेकर खूब सुना सुनाया गया। उनकी नियुक्ति को चुनौती देने के लिए जो कहानियां सुनाई गईं उन्हें आधार मानकर स्थानीय अदालत ने पुलिस को जांच की जवाबदारी दे दी । ईडी की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका के जवाब में श्रीमती अनुराधा सिंघई ने उच्च न्यायालय के सामने अपना पक्ष प्रस्तुत किया और अदालत ने उन्हें अपना काम जारी रखने के लिए क्लीनचिट दे दी। अदालत ने झूठे तथ्यों के आधार पर अदालत और प्रशासन का समय बर्बाद करने वाले षड़यंत्रकारियों को भी फटकार लगाई है। अदालत की कड़ी पड़ताल के बाद तो अब इन षडयंत्रकारियों को बाज आना चाहिए। शासन को भी अपने उन महत्वाकांक्षी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आगे आना होगा जिनसे मध्यप्रदेश में सुशासन स्थापित होने जा रहा है। कुशल युवाओं को साथ लेकर एक सफल प्रदेश का निर्माण होने जा रहा है। प्रदेश में अब तक की जो राजनीति चलती रही है उसकी वजह से आज भी प्रदेश के विकास की रफ्तार गुजरात या अन्य राज्यों की तरह तेज गति नहीं पकड़ सकी है। अब तक की कांग्रेसी सरकारें रहीं हों या लगभग दो दशकों का भाजपा का शासनकाल दोनों के दौरान कभी बंधे बंधाए ढर्रे से आगे देखने की परंपरा विकसित नहीं हो पाई।संघ और भाजपा संगठन की आड़ लेकर भी कई बार षड़यंत्रकारियों ने सुशासन को ध्वस्त करने के प्रयास किए।इसके बावजूद कुछ प्रतिभाशाली अफसरों ने पहल करके रचनाधर्मी युवाओं को आगे लाने की जो मुहिम चलाई वह अब सफलीभूत होती नजर आने लगी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि कृषि पर बोझ घटाने के लिए हमें उद्यमिता को बढ़ावा देना होगा ताकि विशाल युवा वर्ग को हम नौकरियां उपलब्ध करा सकें। ऐसे में कंपनी सेकेट्री के रूप में लंबा अनुभव रखने वाली अनुराधा सिंघई जैसै प्रतिभाशाली प्रबंधकों पर हमें भरोसा करना होगा।उनके नेतृत्व में सैडमैप न केवल सरकारी प्रतिष्ठानों बल्कि कार्पोरेट जगत के लिए भी युवाओं की खेप तैयार कर रहा है। ऐसे में उन्हें सहारा देकर अवसर भी देना होगा ताकि प्रदेश एक नए दौर में प्रवेश कर सके। हम अपने पुरातनपंथी सोच को ही पकड़े बैठे रहेंगे और उसी के अनुसार लोगों को घुटने के स्तर पर लाते रहेंगे तो राज्य को ऊंचाईंयों तक नहीं पहुंचाया जा सकेगा। सेना की अग्निवीर योजना का विरोध करने वालों को अहसास भी नहीं कि पुरानी पेंशन स्कीम का शोर मचाकर वे युवाओं को किस अंधे कुएं में धकेल रहे हैं। कार्पोरेट सेक्टर में आरक्षण का षड़यंत्र करके किस तरह आरक्षित वर्ग के विशाल तबके को रोजगार के मंगलमयी अवसरों से वंचित कर रहे हैं। हमें पुराने शासकों और पुरानी सोच में ढल चुके लोगों को सख्ती से गो बैक कहना होगा। यदि लोकतंत्र के नाम पर लूजर्स को सत्ता के नजदीक जगह दी जाएगी तो विनर्स के माध्यम से रचे जा रहे नए संसार से हम प्रदेश को वंचित कर देंगे। हमें इस लोकतंत्र को नए संदर्भों में रीसेट होने देना होगा। सरकार ने अब तक अफवाहों पर ध्यान दिए बगैर स्वविवेक से फैसले लिए हैं। उसे इसी तरह आगे बढ़ते रहना होगा, तभी हम भारत माता के परम वैभव के लक्ष्य तक पहुंच पाएंगे।

  • जनता ने तो चुन लिया मोदी मार्ग

    जनता ने तो चुन लिया मोदी मार्ग


    मोदी सरकार को जनता तीसरी बार सत्ता में भेजने जा रही है। अब तक पांच चरणों के चुनाव में साफ हो गया है कि भाजपा और एनडीए गठबंधन भारी जनसमर्थन से सरकार में पहुंच रहा है। ये जनादेश देश के विकास का जनादेश होगा। पहली बार न तो कोई सहानुभूित की लहर है और न ही जाति धर्म के दलालों की जोड़ तोड़। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सीधे जनता से संवाद कर रहे हैं और कारगर संवाद के माध्यम से अपनी सरकार के कार्यकलापों का उल्लेख करके कार्यकाल का जनादेश जुटा रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा और अमित शाह के मार्गदर्शन में चल रहे इस महाभियान में दुनिया की सबसे विशाल लोकतांत्रिक पार्टी एक स्वर में चुनाव लड़ रही है। अंग्रेजों ने जब भारत के टुकड़े करके यहां धर्म आधारित फूट के बीज बोए थे तब उन्हें भी एहसास नहीं था कि कभी उनके तमाम प्रयासों को भारत का सनातन धता बता देगा। सनातन ने हमेशा से सभी धर्मों का सम्मान करना सिखाया है। वसुधैव कुटुंबकम का विचार पूरी दुनिया को परिवार मानने का संदेश देता है इसके बावजूद अंग्रेजों के प्रश्रय से पनपी कांग्रेस ने सतर सालों तक जाति ,धर्म,भाषा का ऐसा वैमनस्य बोया कि जनता सिर फुटौव्वल में ही लगी रही। सबको एक करने का विचार लिए जनसंघ हो या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इनके करोड़ों कार्यकर्ताओं की पीढ़ियां खप गईं। गरीबी दूर करने का स्वप्न दिखाकर नेहरू गांधी परिवार ने लगातार सत्तर सालों तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लूट का साझीदार बनाए रखा। बाबा रामदेव के पातंजलि आर्युवेद जैसे सैकड़ों प्रकल्पों ने देश को पहली बार बताया कि अहिंसात्मक चिकित्सा ही समाज को बेहतर जीवन दे सकती है। इसके पहले तो एलोपैथी के माध्यम से समाज को स्वास्थ्य प्रदान करने का ऐसा अभियान चलाया गया था कि लोगों को लगता था यदि उन्हें दवा नहीं मिली तो उनका जीवन नष्ट हो जाएगा। स्वयंसेवकों ने इतने विशाल देश को जीवन संयम की डोर में बांधकर जैसा पुनर्जागरण चलाया उन्हें समझाया कि सर्जरी जैसी उपचार विधि आपातकाल में जरूरी होती है स्वस्थ्य रहने के लिए तो जीवनशैली में बदलाव लाना होंगे। आज भी देश की बड़ी आबादी जीवनशैली जनित बीमारियों से ग्रस्त है। उन्हें नहीं मालूम कि बहुत छोेटे उपाय उनका जीवन खुशहाल बना सकते हैं। नरेन्द्र मोदी अपने चुनाव प्रचार अभियान को लोकतंत्र का उत्सव बताते हैं। इसके विपरीत शैतान पर कंकर फेंकने की सोच से भरे कांग्रेस के राहुल गांधी बदतमीजी की भाषा में प्रधानमंत्री को गाली देते फिरते हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी मुस्लिमों को उकसाकर दंगे करवाकर सत्ता में बने रहने का प्रयास कर रहीं हैं। अखिलेश यादव ,की समाजवादी पार्टी हो या केरल के वामपंथी सभी लड़ने मारने पर उतारू हैं।इसके विपरीत भाजपा के प्रचारक अपनी वोटर सूची का पन्ना संभाले लोगों से मतदान की अपील कर रहे हैं। चुनाव अभियान का असर ये है कि कांग्रेस का निराश मतदाता तो पोलिंग बूथ तक भी नहीं पहुंच रहा है। उसे लगता है कि इंडी गठबंधन की विचारधारा समय के साथ पिछड़ गई है। धारा 370 हो या राममंदिर निर्माण जैसे तमाम मुद्दों पर इस गठबंधन की पहले ही करारी हार हो चुकी है।आज वह खलनायक बनकर समाज के बीच खड़ा है ऐसे में आम जनता उससे दूरी बनाकर रखने में ही अपनी भलाई समझ रही है। जाहिर है इसका सीधा लाभ एनडीए गठबंधन को ही मिलना है। भाजपा की राज्य इकाईयां भले ही अब तक विकास की मुख्यधारा को आत्मसात नहीं कर पाईं हों लेकिन जिस तरह चुनाव प्रचार अभियान में हर बिंदु पर प्रवक्ता की तरह प्रकाश डाला गया उससे संगठन को बड़ा सहारा मिला है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की पूर्ववर्ती सरकार आत्मनिर्भरता के मुद्दे पर बहुत कुछ नहीं कर पाई थी। ऐसे में जनता के बीच असंतोष भी बढ़ गया था लेकिन चुनाव अभियान ने जनता से जिस तरह संवाद किया उससे वो नाराजगी दूर हो गई। डॉ.मोहन यादव की सरकार अभी तक अपना काम शुरु नहीं कर पाई है वह भी चुनाव अभियान की जिम्मेदारी उठाए हुए है। भाजपा का केन्द्रीय प्रचार अभियान इतना सफल जन शिक्षण कर रहा है कि उससे आम नागरिक तक को अपना लक्ष्य साफ नजर आने लगा है। मध्यप्रदेश की डॉ.मोहन यादव सरकार से देश को भारी अपेक्षाएं हैं। देखना है कि विकास की जो समझ देश के बीच विकसित हुई है उसकी कसौटी पर वर्तमान सरकार किस हद तक सफल होती है. फिलहाल मतदान के दो चरण बाकी हैं और बहुत सारी प्रमुख सीटों पर मतदान होना है । प्रचार की लय इतनी सुरीली है कि देश टकटकी लगाए उसे सुन रहा है। वोट कर रहा है। जाहिर है कि सकारात्मक अभियान अपने बड़े लक्ष्य को भी आसानी से वेध लेगा। एनडीए लगभग चार सौ सीटों पर पहले ही काबिज है अब वह चार सौ पार की ओर बढ़ रहा है।

  • सरकार ने तय किया तो विकास पथ पर बढ़ चला सैडमैप

    सरकार ने तय किया तो विकास पथ पर बढ़ चला सैडमैप


    कांग्रेस में भगदड़ मची है और सभी समझदार देशभक्त पुरानी लीक छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं। इसकी वजह विकास की वो इबारत है जो मोदी सरकार ने बुलंद आवाज के रूप में उद्घोषित की है। मुक्त बाजार व्यवस्था का आगाज तो भारत में पूर्व प्रधानमंत्री पी व्ही नरसिंम्हाराव की सरकार ने किया था लेकिन उस पर अमल करने का भगीरथ नरेन्द्र मोदी की भाजपा ही कर पाई है। राहुल कांग्रेस आज भी मानने तैयार नहीं है कि उनके पूर्वज कितनी बड़ी गलती कर रहे थे। वे बार बार कांग्रेस की उसी विचारधारा के सहारे फूट के बीज बोकर गरीबी को संरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं जो उनकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता मजबूत करने के लिए लागू की थी। जातिगत जनगणना हो या सरकारीकरण सभी का फटा ढोल पीटती राहुल कांग्रेस आज भी देश में भ्रमजाल फैलाने में जुटी है। अडानी अंबानी को गालियां देकर राहुल गांधी और उनकी चिलम भरने वाले कांग्रेसी बार बार विकास के पैरों में बेडियां पहनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन जनता अब इस भ्रमजाल से बाहर निकल चुकी है। मध्यप्रदेश की भाजपा पर जबसे शिवराज सिंह चौहान की कांग्रेस की पूंछ पकड़कर चलने वाली सरकार का साया हटा है तबसे राज्य की भाजपा देश के मूलभूत विचार पथ पर मजबूती से कदम बढ़ाती नजर आ रही है। सरकार के निगम,मंडलों और संस्थाओं में सरकार की बदली कार्यप्रणाली की छाप स्पष्ट तौर पर दृष्टिगोचर होने लगी है। डॉक्टर मोहन यादव सरकार ने उन फिजूल योजनाओं को बंद कर दिया है जिनके माध्यम से सत्ता माफिया अपना उल्लू सीधा करता था। गरीब कल्याण की बात कहकर माफिया के गुर्गे ठेके, सप्लाई ,निर्माण आदि में खजाने की चोरी करते थे। हालांकि आज भी इन मुफ्तखोरों पर पूरी तरह अंकुश नहीं लग पाया है इसके बावजूद सरकार के प्रतिष्ठान इन नई राह पर धीरे धीरे बढ़ चले हैं। सरकार को प्रशिक्षित कार्यबल उपलब्ध कराने के लिए बनाया गया सैडमैप अपने काम को कुशलता पूर्वक अंजाम दे रहा है। सरकार के संरक्षण में यहां ऐसा प्रबंधन अपना कार्य कर रहा है जिससे संस्थान की आय में कई गुना इजाफा हो गया है। सिक्योरिटी एजेंसी, प्रशिक्षण संस्थाओं और नियोक्ताओं की आड़ में मलाई काटने वाले माफिया को खदेड़कर बाहर कर दिए जाने से मुफ्तखोरों का एक बड़ा वर्ग आहत हो गया है। भारत सरकार हो या राज्य सरकार दोनों आगे बढ़ते इस संस्थान को लगातार अपना संरक्षण और संबल प्रदान कर रहे हैं। वे जानते हैं कि विरोध या गड़बड़ियों के आरोप लगाने वाले कौन हैंऔर क्यों तिलमिला रहे हैं। जिन प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बंद किया गया है उनके विकल्प के रूप में जो ढांचा खड़ा किया जा रहा है वह युवाओं के लिए ज्यादा उपयोगी और कारगर है। सरकार पर बोझ घटाने में भी ये सुधारात्मक उपाय सहयोगी साबित हो रहे हैं। दरअसल आजादी के बाद से संरक्षण वाद और बेचारगी को सहारा देने का जो भाव सरकारों के बीच पनप गया था उससे इतर कोई भी उपाय लोगों को आक्रामक नजर आता है। लोगों को लगता है कि यदि सरकार ने कृपा नहीं की तो देश भूखों मर जाएगा। जबकि जनता के विकास कार्यों को संरक्षण देने का सबसे उचित तरीका यह है कि उन पर से मुफ्तखोरों का बोझ हटा दिया जाए। यदि माफिया के संरक्षण में पनप रहे ये मुफ्तखोर खदेड़ दिए जाएंगे तो जाहिर है कि सरकार की कार्यक्षमता में जो इजाफा होगा उसका लाभ सीधे आम जन को मिलने लगेगा। सैडमैप अपने आर्थिक संसाधनों को लगातार विकसित कर रहा है और अपनी उपयोगिता स्थापित करता जा रहा है। कमोबेश ऐसे ही सुधार तमाम निगम मंडलों के लिए अपरिहार्य है। सरकार को कारगर और उपयोगी समूहों का नेतृत्व कर्ता बनाना है तो जाहिर है कि गरीबी और बेचारगी के नाम पर फल फूल रहे माफिया की विदाई करना सबसे उचित फैसला होगा। इसका विरोध करने वालों को भी अपनी सोच पर एक बार ठहरकर आत्ममंथन करना चाहिए ताकि वे अपनी गलतियों को सुधार सकें।

  • अब बिट्वीन द लाईंस भी देखना पड़ेगा मुख्यमंत्री जी

    अब बिट्वीन द लाईंस भी देखना पड़ेगा मुख्यमंत्री जी


    अवैध हड़ताल से देश को ठप करने वालों की औकात क्या इतनी हो सकती है कि वे जनता की सरकार को भी चुनौती देने लगें। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सारे तथ्यों पर विचार करके कहा कि हड़ताल अवैध है, सरकार जनसुविधाएं बहाल करे । ऐसे में प्रशासन को आगे बढ़कर गतिरोध हटाना ही था। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद शाजापुर कलेक्टर जब पूरे देश को चुनौती देने वाले किसी अपराधी को ललकार लगाए तो उसमें भाषा के लालित्य पर सवाल नहीं उठाया जा सकता । देश के हमलावर को आत्मरक्षा में तैनात सैनिक बंदूक की गोली से मारे या लाठी से या फिर मुक्के लात से,ये थोड़ी देखा जाता । उसका तो उद्देश्य शत्रु पर विजय पाना है। कुछ लाल बुझक्कड़ बुद्धिजीवी ऐसे टसुए बहाने निकल पड़े कि सरकार ने अपने ही कलेक्टर को हटाकर मंत्रालय में बिठा दिया। इस पहले मूव ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। डॉक्टर मोहन यादव को जिन्होंने करीब से देखा है वे जानते हैं कि मुख्यमंत्री लीक पकड़कर चलने वालों में से नहीं हैं। इसके बावजूद सत्ता के इर्द गिर्द झुंड जमा लेने वाले दरबारियों के सामने तो राजा विक्रमादित्य की भी मति मारी जाए। लगभग दो दशकों में शिवराज सिंह चौहान ने अपने इर्द गिर्द चमचों और चिलमकारों की ऐसे फौज जमा कर रखी थी कि सरकार किसी और पटरी पर चली गई थी। इन कुकर्मों को छुपाने के लिए इन चमचों ने एक स्वर में इसे संघ का फरमान बताना शुरु कर दिया था। जन आक्रोश की इसी अभिव्यक्ति के रूप में कमलनाथ गिरोह को सत्ता में घुसपैठ का अवसर मिल गया था। ज्योतिरादित्य सिंधिया की एंट्री न हुई होती तो हालिया चुनाव भाजपा को विपक्ष में बैठकर लड़ना पड़ता। सिंधिया के आने के बावजूद सरकार का कामकाज इतना लचर और जड़ था कि उसे किसी नजरिए से सुशासन नहीं कहा जा सकता। ये तो गनीमत है कि जनता की और पार्टी कार्यकर्ताओं की टीस को भाजपा हाईकमान ने सुन लिया और शिवराज को पैवेलियन में भेजकर सत्ता परिवर्तन की जन आकांक्षा पूरी कर दी। समस्या ये है कि सत्ता के सिंहासन पर बदलाव अभी पूरी तरह नहीं हुआ है। शिवराज के बहरे सत्ताभोगियों को साथ लेकर सुशासन करने निकले मोहन यादव अभी तक अपना राज स्थापित नहीं कर सके हैं। किशोर कान्याल को हटाने के फैसले से इतना तो साफ झलकता है कि वे अपनी सोच और पार्टी की विचारधारा को स्थापित करने के लिए बदलाव करना चाहते हैं। ये बदलाव गलत मोड़ पर हुआ है। किशोर कान्याल मध्यप्रदेश के जमीनी प्रशासन को समझने वाले प्रतिभाशाली अफसर हैं। राज्य प्रशासनिक सेवा के कई जिम्मेदार पदों पर रहते हुए उन्होंने जमीनी हकीकत को करीब से देखा है। जनोन्मुखी शासन शैली का तो खुमार उन पर इतना अधिक है कि वे अपना हर कार्य सार्वजनिक तौर पर करते हैं। जब ड्राईवरों की हड़ताल पर चर्चा के लिए कलेक्टर के चेंबर में बातचीत चल रही थी तब भी उन्होंने मीडिया को चर्चा में उपस्थित रहने की अनुमति दे रखी थी। ड्राईवरों की हड़ताल को विपक्ष ने पूरे देश में कुछ इस तरह प्रचारित किया था मानों वे देश के कर्मठ सिपाही हैं और सरकार उन्हें कुचलकर मार देना चाहती है। हिट एंड रन पर बना कानून एक दिन में अस्तित्व में नहीं आया। पूरी सुविचारित प्रक्रिया से इसे तैयार किया गया है। विपक्ष का कहना था कि जब वे सदन में कम संख्या में मौजूद थे तब सरकार ने बगैर चर्चा के इसे पास करा लिया। जबकि हकीकत ये है कि विपक्ष के जो सदस्य सदन में मौजूद थे उन्होंने भी बिल का समर्थन किया था। कानून से ड्राईवरों को खतरा क्यों महसूस हो रहा है। यदि वे सही चल रहे हैं और कोई व्यक्ति अपनी गलती से उनके वाहन के नीचे कुचलकर मर जाता है तो इसे अदालत में साबित करके वे साफ बच सकते हैं। अब नेशनल हाईवे पर जंगल में यदि कोई दुर्घटना होती है जहां कोई जनता मौजूद नहीं है तो ड्राईवर को भागने की जरूरत क्या है। वह जाकर प्रशासन को सूचना दे सकता है कि फलां राहगीर शराब के नशे में या किसी तकनीकी खामी की वजह से उसके वाहन के नीचे आ गया है कृपया उसे उपचार उपलब्ध कराएं। कोई कानून इतना अंधा तो है नहीं कि गलती न होने के बावजूद ड्राईवर को सात साल की जेल और दस लाख रुपए के जुर्माने की सजा दे दे। सभी ट्रकों में अभी तक कैमरे और जीपीएस नहीं लगाए गए हैं। निजी कंपनियां थर्ड पार्टी बीमे का प्रीमियम समय पर भरती नहीं। राहगीरों की सुरक्षा वे सुनिश्चित करती नहीं। इस पर ड्राईवरों को ऐसा भयभीत कर दिया कि वे बेचारे कानून के भय से कांपने लगे। कानूनी प्रावधान यदि गलत हैं तो सही प्रक्रिया अपनाकर उन्हें बदला भी जा सकता है। इसके बावजूद विपक्ष और खासतौर पर कांग्रेस ने हो हल्ला मचाकर देश भर में भय का वातावरण निर्मित कर दिया। लोकहित में लड़ने वाले शूरवीर अधिकारियों को सलाम किया जाना चाहिए कि उन्होंने विपरीत हालात में भी मोर्चा संभाला और नागरिकों को जरूरी सामानों की सप्लाई बाधित नहीं होने दी। कलेक्टर महोदय की क्लीपिंग वायरल करने वाले टीआरपी प्रेमी पत्रकारों मौका हाथ से नहीं जाने दिया। दरअसल जिन पत्रकारों ने ये काम किया उनकी ये समझने की औकात भी नहीं थी कि सामाजिक दायित्वों का निर्वहन कैसे किया जाता है। शायद यही वजह है कि राजनेता और प्रशासन अक्सर मीडिया कर्मियों को विमर्श स्थल से बाहर खदेड़ देते हैं। सीधी भर्ती वाले आईएएस अफसरों की टीस तो समझी जा सकती है पर सत्ता पर आसीन राजा विक्रमादित्य की सोच में पले बढ़े राजनेता की आंख पर भी वे पट्टी बांध दें ये कैसे संभव हो सकता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को तो कम से कम सुशासन का समर्थन करते हुए कलेक्टर को अपना संरक्षण देना था। वे भी एक गलत नारे की रौ में बह निकले। ये अंग्रेजों की विदेशी सरकार तो है नहीं। संवैधानिक कानून का विरोध करने के लिए अब जनांदोलन जरूरी नहीं है। कानून उनकी ही सरकार ने बनाया है वे अपनी ही सरकार से इसमें सुधार करवा सकते हैं। इसके लिए आंदोलन की तो जरूरत ही नहीं है। सरकार ने कानून को लागू करने की अवधि बढ़ाने की बात कहकर मौजूदा गतिरोध तो टाल दिया है लेकिन उसे नहीं भूलना चाहिए कि वह जनता की निर्वाचित सरकार है। दबाव की राजनीति करने वाले चंद बदमाशों के दबाव में वह अपने दायित्व से मुकर नहीं सकती। नए नए मुख्यमंत्री जी को भी यही सलाह है कि वे अब बिट्वीन द लाईन्स भी देखना शुरु करें। सत्ता के शीर्ष पर बैठकर जो दिखाया जाता है वह हमेशा सही नहीं होता।यदि इस तरह के फैसले सामने आएंगे तो फिर कौन अधिकारी जनहित की लड़ाई लड़ने की हिम्मत करेगा।

  • चुनावी रण में फैली भाजपा की राजनैतिक शुचिता की खुशबू

    चुनावी रण में फैली भाजपा की राजनैतिक शुचिता की खुशबू

    भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र और राज्य सरकारों ने अपनी अंत्योदय की विचारधारा पर अमल करते हुए गरीब कल्याण की जो योजनाएं शुरु की हैं उनका असर चुनाव प्रचार अभियान में साफ नजर आने लगा है। मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल रतलाम से चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत करने पहुंचे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अभिनंदन जिन उमंगों से भरे जन समुदाय ने किया उसे देखकर साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऊंट किस करवट बैठने जा रहा है। इस चुनाव प्रचार अभियान में भाजपा के नेतागण जन शिक्षण के लिए सिलसिलेवार संवाद कर रहे हैं। इससे चंद दिनों पहले जिन सर्वेक्षणों के अनुमानों में भाजपा पिछड़ी बताई जा रही थी उनके आकलन अब बदलने लगे हैं। रतलाम में प्रधानमंत्री की सभा आयोजित कराने का फैसला भी पार्टी ने केवल इसीलिए लिया क्योंकि पिछले चुनावों से लेकर अब तक भाजपा ने आदिवासी समुदाय तक अपनी ढेरों योजनाओं की सीरीज पहुंचा दी है। पिछले चुनावों में आदिवासी समुदाय कांग्रेस की लफ्फाजियों का कड़वा घूंट भी पी चुकी है। ऐसे में भाजपा की योजनाएं उसे राहत महसूस करा रहीं हैं। चंद दिनों पहले ये हवा बनाई गई कि शिवराज सिंह चौहान और एमपी की भाजपा से जनता ऊब चुकी है। चुनावी सभाओं में भाजपा नेतृत्व को जो समर्थन मिलता दिख रहा है उसे भी ये कथित चुनावी पंडित नहीं देखना चाहते। हकीकत ये है कि कांग्रेस अपने कड़वे और ओछे बर्ताव से लगातार जन समर्थन खोती जा रही है। आज मध्यप्रदेश का बजट तीन लाख चौदह हजार करोड़ रुपए का है। भाजपा ने हर वर्ग और समुदाय के लिए योजना बनाकर उत्पादकता बढ़ाने का अभियान चला रखा है। जबकि प्रदेश की आय मात्र पचासी हजार करोड़ रुपए है। ऐसे में सरकार ने अपनी निर्धारित सीमा में कर्ज लिया है और योजनाओं पर अमल किया है। दरअसल सरकार जिन दस लाख लोगों को नियमित वेतन देती है उसमें सरकार की आय में से पचास फीसदी से अधिक राशि खर्च हो जाती है। ऐसे में वह मात्र तीस -चालीस हजार करोड़ रुपए से योजनाएं चलाकर आय बढ़ाने के साधन विकसित कर रही है। अकेले वेतन-भत्ते को देखें तो वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक पचास हजार करोड़  रुपये से अधिक इस पर व्यय हो रहे हैं। पेंशन और ब्याज भुगतान की सीमाएं भी बढ़ती जा रहीं हैं। सरकार की लाड़ली बहना योजना, लाड़ली लक्ष्मी योजना ,किसान सम्मान निधि,मुफ्त राशन वितरण, उज्जवला योजना, घर घऱ जल पहुंचाने वाले जल जीवन मिशन आदि को लेकर ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि शिवराज सिंह जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई फिजूल लुटा रहे हैं। जबकि हकीकत बिल्कुल विपरीत है। जिस राज्य की आय मात्र पिचासी हजार करोड़ रुपए हो और वह तीन लाख चौदह हजार करोड़ रुपए खर्च करे तो ये उसके कुशल वित्तीय प्रबंधन के बगैर संभव नहीं है। सरकार की इन योजनाओं पर देश विदेश और प्रदेश से जिस तरह धन बरस रहा है वह सरकार की साख के बगैर आना संभव नहीं है। भारतीय जनता पार्टी ने इस कार्य में वित्तीय प्रबंधन में कुशल लोगों की सेवाएं ली हैं। कभी लाचार रहे मध्यप्रदेश को वित्तीय साधन उपलब्ध कराने वाले राघवजी भाई आज भले ही नेपथ्य में हों लेकिन रतलाम में आयोजित जनसभा में मंदसौर सांसद सुधीर गुप्ता और रतलाम विधायक चेतन काश्यप के माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी ने ये संदेश देने की कोशिश की है कि भाजपा का अक्षय पात्र कभी खाली नहीं हो सकता। पार्टी ने पूर्व वित्तमंत्री जयंत मलैया को दमोह से प्रत्याशी बनाया है जो अर्थव्यवस्था के खासे जानकार हैं।जावद से ओमप्रकाश सखलेचा हैं जो पूर्व मुख्यमंत्री वीरेन्द्र सखलेचा के पुत्र हैं और औद्योगिकीकरण के विशेषज्ञ हैं।लघु और मध्यम उद्योगों के विकास में उन्होंने नए माडल विकसित किए हैं।सागर के शैलेन्द्र जैन प्रसिद्ध बीड़ी घराने से आते हैं।स्थिति ये है कि उनकी साख की काट के रूप में कांग्रेस ने उनके ही छोटे भाई सुनील जैन की धर्मपत्नी को मैदान में उतार दिया है। ये कांग्रेस की हताशा नहीं तो क्या है। शिवपुरी से देवेन्द्र जैन, निवाड़ी से अनिल जैन,जैसे प्रत्याशी उतारकर भाजपा ने अपने उद्यमी समर्थकों का भरोसा जीतने का प्रयास किया है।कांग्रेस बरसों से भाजपा के ऐसे सहयोगियों को काटने का प्रयास करती रही है। इसी फेर में उसने भी कई जैन प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं लेकिन नकली ढोल की पोल चुनावी दौड़ में फटती नजर आ रही है।  ये समुदाय अपनी उद्यम शीलता और दान शीलता के लिए जाना जाता है।केवल रतलाम में चैतन्य काश्यप फाऊंडेशन के माध्यम से लोकसेवा की परिभाषा बदल दी गई है। गरीबी से मुक्ति, सामाजिक उत्थान, धार्मिक सद्भाव,खेल और शिक्षा के प्रोत्साहन के लिए फाऊंडेशन ने जो कार्य किए हैं वे अदभुत हैं। यहां अहिंसा ग्राम बनाकर लगभग सौ परिवारों को निःशुल्क आवास दिए गए हैं। यहां आजीविका, रोजगार प्रशिक्षण,संस्कार, शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्थाएं एक ही परिसर में उपलब्ध हैं। इसी तरह मंदसौर के बिलांत्री गांव में पंडित दीन दयाल शताब्दी ग्राम बसाया गया है। फाऊंडेशन की ओर से कुपोषित बच्चों का जीवन संवारने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। समाजसेवा में संलग्न लोगों के लिए स्थायी भोजनशाला ही बना दी गई है।यहां बनाया जा रहा गोल्ड काम्पलेक्स आने वाले समय में देश की सबसे बड़ी सोने की मंडी साबित होने जा रहा है। भाजपा ये संदेश देने का प्रयास कर रही है कि राजनीति सेवा का माध्यम है न कि सत्ता की लूट का उपाय। आदिवासी अंचल में इन योजनाओं के माध्यम से भाजपा ने तस्वीर ही बदलकर रख दी है। जिस आदिवासी अंचल का माछलिया घाट लूट के लिए जाना जाता था वह आज खेती और विकास के लिए जाना जाता है। पिछले चुनाव में कांग्रेस की कमलनाथ दिग्विजय सिंह ब्रिगेड ने जयस के माध्यम से आदिवासियों को बरगलाने का प्रयास किया था जो भाजपा के बहुमत से पिछड़ने की बड़ी वजह बना था। इस बार काठ की वो हांडी चढ़ने लायक नहीं बची है। लाड़ली बहना योजना से लगभग एक लाख तीस हजार करोड़ महिलाओं को लाभ दिया जा रहा है। ये परिवार प्रदेश की प्रगति में वर्कफोर्स को बढ़ाने का साधन बन रहे हैं। इन योजनाओं को बदनाम करने वाले आरोप लगाते हैं कि इससे शराबखोरी और मक्कारी बढ़ रही है जबकि वे ये नहीं देखते कि किस तरह उत्पादकता में लगे लोगों को सरकार की योजनाएं संबल प्रदान कर रहीं हैं। किसान सम्मान निधि ने कृषकों को इतना उत्साहित किया है कि आज कृषि उत्पादन सारे पिछले रिकार्ड तोड़ रहा है। सिंचाई की योजनाओं ने खेती का उत्पादन बढ़ाया है। इसके बावजूद सत्ता को चोरी और ठगी का माध्यम बनाने वाले मक्कार लगातार भ्रम फैलाकर सत्ता पर काबिज होने का प्रयास कर रहे हैं जिस कांग्रेस ने देश को भाषा, जाति, धर्म, समुदाय के आधार पर बांटकर अपनी रोटियां सेंकी वही ये कहती फिर रही है कि सत्ता की रोटी पलटते रहना चाहिए नहीं तो जल जाती है। इसके बावजूद प्रदेश की जनता ने चार बार से भाजपा को सत्ता पर बिठाया और पांचवी बार भी उसका यही इरादा नजर आ रहा है। कई चूक भी हुई हैं। भाजपा ने सत्ता और संगठन के महत्वपूर्ण पद अपने चहेतों से भर दिए , इसके कारण जनसंवाद की निरंतरता बाधित हुई है। अब चुनावी जन शिक्षण के दौरान भाजपा के नेता अलग अलग अंदाज में अपनी बात कह रहे हैं। इससे जनता में फैलाए गए भ्रम का कुहासा छंटने लगा है। भाजपा ने अपना यही जन शिक्षण जारी रखा तो कोई आश्चर्य नहीं कि वह मध्यप्रदेश में  गुजरात से भी ज्यादा बंपर जीत का रिकार्ड बना सकती है। मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा कहते हैं कि हमारे 41 लाख कार्यकर्ता यदि हमारे दो करोड़ 51 लाख हितग्राहियों को वोट डलवाने में सफल हो जाते हैं तो हमारी सरकार ज्यादा मत प्रतिशत से विजयी हो जाएगी। जिन एक करोड़ नागरिकों को हमने प्रदेश में गरीबी के जंजाल से बाहर निकाला है वे भाजपा की सेवा भावी राजनीति के एंबेसेडर बन चुके हैं।कुल पांच करोड़ 61 लाख मतदाताओं में से 56 फीसदी तक भाजपा की हितग्राही मूलक योजनाओं का लाभ पहुंचा है ऐसे में हमारी जीत का आंकड़ा पिछले सभी रिकार्ड तोड़ सकता है। लोकतंत्र और निष्पक्षता की दुहाई देकर कांग्रेस या किसी अन्य राजनीतिक दल की पैरवी करने वालों को समझ लेना होगा कि भाजपा का विकल्प अब केवल बेहतर भाजपा ही हो सकती है। भाजपा हाईकमान को भी अपनी जवाबदारी समझना होगी और उसे भ्रष्ट सत्तामाफिया के कठपुतली शासकों को विदा करके खांटी जनसेवकों को कमान थमानी होगी,तभी दीनदयाल उपाध्याय जी का अंत्योदय प्रदेश को नई ऊंचाईयों तक ले जा सकेगा।

  • सत्ता की दौड़ से बाहर होती कमलनाथ कांग्रेस

    सत्ता की दौड़ से बाहर होती कमलनाथ कांग्रेस


    चुनावों की आचार संहिता लागू होने में समय है लेकिन कमलनाथ की कांग्रेस अभी से पंचर हो गई है। भारतीय जनता पार्टी ने कारगर कार्यशैली अपनाकर जनता से जो संवाद स्थापित किया है उससे कांग्रेस के रणनीतिकार बौखला गए हैं। पिछले चुनावों में बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया था और सत्ता में पहुंचे कमलनाथ का दंभ सत्रहवें आसमान पर पहुंच गया था । ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जब उनके लटके झटके करीब से देखे तो उन्होंने जनता से की जा रही गद्दारी से अपना नाता तोड़ लिया था । नाथ की सरकार जब औंधे मुंह गिरी तभी से वे विक्षिप्त हो गए हैं। अपनी मनोदशा पर वे जैसे तैसे काबू बनाए हुए थे लेकिन इस चुनाव के पहले जनता में भाजपा के प्रति जो प्रेम और विश्वास उमड़ रहा है उसे देखकर तो कमलनाथ अपना आपा खो बैठे हैं। इंदौर में मतंग समाज के कार्यक्रम में उन्होंने साजिशन पत्रकारों को धक्के देकर बाहर निकाल दिया। ऐसा नहीं कि पत्रकारों को गरियाने का उनका ये पहला मामला है। वे हमेशा से प्रेस को धकियाने का प्रयास करते रहते हैं। इसके बावजूद मीडिया उनकी बातों को जनता तक पहुंचाने का अपना दायित्व निभाता रहा है। पिछले चुनावों में अधिक वोट पाने के बावजूद जब भाजपा सत्ता से दूर रह गई तब कमलनाथ ने कुर्सी पाते ही पत्रकारों को गरियाना शुरु कर दिया था। उन्होंने बदतमीजी भरे अंदाज में कहा कि मैं अखबारों में अपनी फोटो नहीं छपवाना चाहता हूं इसलिए आप पत्रकारिता छोड़कर कोई दूसरा धंधा अपना लो। दंभ से चूर गांधी परिवार के इस प्यादे को बुढ़ापा आ जाने तक ये नहीं मालूम पड़ा कि पत्रकारिता करने वाले किसी सरकार के भरोसे अखबार बाजी नहीं करते हैं। भारत की प्रेस अपने पैरों पर खड़ी है । वह वास्तव में जनता का उपकरण है। जनता ही उसे जिंदा रखती है। किसी सरकार की इतनी हैसियत नहीं कि वह प्रेस को कुचल पाए। इसके बावजूद कुर्सी पाते ही कुछ लोगों को मुगालता हो जाता है कि वे प्रेस को अपने घर के बाहर बंधा कुत्ता बना लेंगे। दरअसल अंग्रेजों की एजेंट रही कांग्रेस हमेशा से प्रेस पर लगाम लगाने का प्रयास करती रही है। सत्ता में आने के बाद कांग्रेस के तमाम बड़े नेता योजनाओं में भ्रष्टाचार करके जन धन की चोरी करते रहे हैं। वे चाहते हैं कि उनकी काली करतूतें अखबारों में न छपें मीडिया पर न दिखाई जाएं । इसके लिए मीडिया को गुलाम बनाए रखने का प्रयास करते रहे हैं । कमलनाथ को इस उठा पटक में महारथ हासिल रहा है। वे आपातकाल के प्रमुख अत्याचारी रहे हैं। नीरा राडिया टेप कांड में उन्हें मिस्टर फिफ्टीन परसेंट कहा गया था। उनकी पूरी राजनीतिक सोच इंस्पेक्टर राज और कमीशनबाजी पर केन्द्रित रही है। यही वजह है कि वे मीडिया का मुंह बंद करने का प्रयास करते रहते हैं । भारतीय जनता पार्टी की शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने समाज के सभी वर्गों को सत्ता में भागीदार बनाया है। जनता के संसाधनों को मिल बांटकर विकास की गति बढ़ाने के उसके प्रयास सफल रहे हैं और आज मध्यप्रदेश सर्वाधिक उत्पादकता कायम रख पाने वाला राज्य बन गया है। भाजपा ने इन प्रयासों को अपने नेतृत्व वाले सभी राज्यों में दुहराया है। यही वजह है कि भाजपा शासित राज्य विकास की पायदानों पर कारगर साबित हुए हैं। ये बात अलग है कि कुछ राज्यों में भाजपा नेतृत्व अपना दायित्व ठीक तरह नहीं निभा पाया और वहां उनकी सरकारें गिर गईं । इसके बावजूद उन विपक्ष शासित राज्यों में विकास भी परवान नहीं चढ़ पाया है। पुरातन सोच रही है कि रोटी को पलटते रहना चाहिए नहीं तो वह जल जाती है। जबकि ये जुगाड़ वाला फार्मूला केवल बकवास है। जैसे ही नए व्यक्ति को सत्ता थमाई जाती है वह भ्रष्टाचार करके अपना घर भरने जुट जाता है। विकास की पद्धतियां बदलती जा रहीं हैं। कांग्रेस की विकास की अवधारणा असफल साबित हुई है। उसका दौर बीत गया है। भाजपा ने लोकतांत्रिक सरकारों की अवधारणा बदलकर रख दी है। देश को समझ लेना चाहिए कि भाजपा का विकल्प अब कांग्रेस या कोई दूसरी पार्टी नहीं है। अब भाजपा का विकल्प केवल भाजपा ही हो सकती है। ये बात जरूर है कि भाजपा के विकल्प के रूप में हमें सुधरी और साफ सुथरी भाजपा बनाना पड़ेगी। ऐसी भाजपा बनाने की जवाबदारी भाजपा को तो निभानी ही है जनता को भी निभानी है। जनता अपनी ये जवाबदारी प्रेस के माध्यम से ही निभाती है। प्रेस तो केवल माध्यम है उसे चुनाव नहीं लड़ना और न जीतना है। ऐसे में वह उन कड़े फैसलों को लागू करने के लिए सरकार पर दबाव बना सकती है जिन्हें सरकारें आमतौर पर न्यायपालिका की ओर खिसका देती हैं।या फिर अपने वोट बैंक को नाराज न करने का जतन करते हुए ठंडे बस्ते के हवाले कर देती हैं। प्रेस की लोकतांत्रिक जवाबदारी है कि वह जनहित के फैसलों को राजनीतिक दलों के बीच संवाद स्थापित करके सख्ती से दबाव बनाकर लागू करवाए । वह मीडिया है लेकिन नपुंसक माध्यम नहीं है। उसकी विचारधारा जनता की विचारधारा है। आधुनिक भारत की जनता देश को आगे बढ़ाना चाहती है। आगे बढ़ाने के उपाय लागू करना चाहती है।इसलिए मीडिया से अपेक्षा करती है कि वह उसकी भावनाओं को लागू करवाएगा। सरकारों ने मीडिया को अपना पुछल्ला बनाने के लिए बड़े मीडिया घरानों को कर्ज के दलदल में फंसा लिया है। आज वह मीडिया को गरियाकर उसे अपनी ताबेदारी के लिए मजबूर करना चाहती है। इसके बावजूद कमलनाथ जैसे कांग्रेसियों को या अन्य राजनीतिक दलों के लोगों को समझ लेना चाहिए कि सौ फीसदी मीडिया उसका गुलाम नहीं है और न कभी ऐसा हो सकता है। नई पीढ़ी के युवा पत्रकार अब धीरे धीरे सरकारों के चंगुल से बाहर निकलते जा रहे हैं। सोशल मीडिया ने उनके हाथों में बड़ी ताकत दे दी है। ऐसे में उन्हें मीडिया से पंगा लेने का मानस बदलना होगा। यदि वे सोचते हैं कि मीडिया को गाली देने से वे मीडिया पर दबाव बना लेंगे तो ये उनकी बड़ी भूल है। इंदौर में मीडिया से की गई उनकी बदतमीजी ने बंद बोतल का ढक्कन खोल दिया है। जिन्न बाहर आ चुका है। अभी चुनाव के लिए कई दौर बाकी हैं। समूचा देश देखेगा कि किस तरह जनता का मीडिया घमंडिया गठबंधन के इस आततायी सोच को खदेड़ बाहर करता है। जो लोग समझते हैं कि वे मीडिया को गाली देंगे तो वह उनकी नालायकी भरी सोच को संबल प्रदान करने लगेगा वे अपनी गलती सुधार लें। मीडिया के कुछ लोग भी अपनी अज्ञानता में ऊटपटांग बयान देने लग जाते हैं वे भी सावधान हो जाएं क्योंकि कमलनाथ जैसे भ्रष्टाचार में निपुण राजनेता कल काम निकल जाने पर उन्हें भी धकेलकर सत्ता से गलियारों से बाहर कर देंगे । जिंदा प्रेस उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भी पहुंचा देता है।

  • विकास का खलनायक बना घमंडिया गठबंधन

    विकास का खलनायक बना घमंडिया गठबंधन


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्षी गठबंधन इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (इंडिया) पर निशाना साधते हुए कहा कि देश के लोगों को इससे सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि यह गठबंधन भारत की संस्कृति और भारत को मिटाना चाहता है. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि गांधी जी से लेकर स्वामी विवेकानंद तक और माता अहिल्या बाई होलकर से लेकर मीराबाई तक हजारों हजार साल तक यह सनातन धर्म, सनातन संस्कृति हर किसी को प्रेरित करती रही है.उन्होंने कहा कि यह सनातन संस्कृति है जो संत रविदास, संत कबीरदास को संत शिरोमणि कहती है. प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसी सनातन संस्कृति को समाप्त करने की कोशिश ‘इंडी’ गठबंधन के लोगों ने की है.पूरे देश के लोगों को इनसे बहुत सतर्क रहना है क्योंकि ये भारत की हजारों साल की संस्कृति को मिटाना चाहते हैं, ये भारत को मिटाना चाहते हैं.उन्होंने कहा कि इन लोगों ने मिलकर एक ‘इंडी’ गठबंधन बनाया है जिसे कुछ लोग घमंडिया गठबंधन भी कहते हैं, लेकिन ‘इंडी’ गठबंधन ने तय किया है कि वह भारत की सनातन संस्कृति को समाप्त करके रहेगा. पीएम मोदी ने कहा, “सनातन संस्कृति वह है जिसमें भगवान राम शबरी को मां कहकर उनके झूठे बेरों को खाने का आनंद लेते हैं. सनातन संस्कृति वह है, जहां राम वनवासियों को, निषाद राज को अपने भाई से भी बढ़कर बताते हैं. सनातन संस्कृति वह है जहां राम नाव चलाने वाले केवट को गले लगाते हैं. सनातन संस्कृति वह है जो किसी परिवार में जन्म को नहीं, व्यक्ति के कर्म को प्रधानता देती है.”
    विकास की अपील और आर्थिक सुधारों की आंधी से उत्साहित भारत का प्रगतिशील समुदाय इन दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस आवाज को गौर से सुन रहा है। वे देश भर में घूम घूमकर विपक्ष को ललकार रहे हैं। सरकारी कार्यक्रमों में भी वे अपनी बात इतने सधे अंदाज में बोलते हैं कि उनके जवाब की प्रासंगिकता खुद ब खुद प्रमाणित हो जाती है। केन्द्र की भाजपा सरकार ने किसान सम्मान निधि जैसी सार्थक योजना से देश को एकसूत्र में बांधने का भगीरथ किया है। वहीं राज्यों की शिवराज सिंह चौहान जैसी सरकारें लाड़ली बहना योजना लाकर जन जन तक अपनी पैठ बना रहीं हैं। मुफ्त योजनाओं की तुलना में नकद भुगतान की योजनाएं भाजपा सरकार की समाधान देने की अपील को कारगर बना रहीं हैं। ऐसे में विपक्ष हताश है। वह जाति, संप्रदाय और परिवारवाद के मुद्दों पर देश के सामने उतरा है। विपक्ष की वैमनस्य से भरी राजनीतिक चालें भी भाजपा की डायरेक्ट भुगतान वाली शैली के सामने चिचिया रहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों में जनधन खातों, प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला गैस कनेक्शन, किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं की जानकारी देते हैं। वहीं शिवराज सिंह चौहान जैसी राज्य सरकारों लाड़ली बहना योजना जैसी तमाम हितग्राही मूलक योजनाओं का हवाला देकर खुद को जनता का असली सेवक बताने में जुटी हैं। ऐसे में विपक्षकी तमाम जाति संप्रदाय आधारित राजनीति अप्रासंगिक नजर आ रही है। आदिवासियों को बरगलाने का जो प्रयास मध्यप्रदेश में पिछले चुनावों में कांग्रेस ने किया था उसके जवाब में भाजपा ने अपनी हितग्राही मूलक योजनाओं का रेला ठेल दिया है। ऐसे में देश विकास के नए जोश से भरता जा रहा है। जाहिर है जन जन में बढ़ रहा ये उत्साह भारत को विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में बढ़ चला है। ऐसे में कथित घमंडिया गठबंधन की फूट डालो राज करो की नीति कब तक अपना असर बचा सकेगी नहीं कहा जा सकता।उसकी राजनीति विकास का खलनायक बनकर रह गई है।

  • ब्रांड असंतुलन साधने के लिए बदली गई ये चुनावी फील्डिंग

    ब्रांड असंतुलन साधने के लिए बदली गई ये चुनावी फील्डिंग


    भारतीय जनता पार्टी ने मध्यप्रदेश में 39सीटों पर प्रत्याशी घोषित करके जिस आक्रामक रणनीति का परिचय दिया था उसी तर्ज पर उसने तीन नए मंत्री बनाकर कथित तौर पर डगमगाती नैया के छेद भी बंद कर दिए हैं। कहा जा रहा था कि विंध्य का ब्राह्मण मतदाता इस बार भाजपा से नाराज है और वह कमलनाथ कांग्रेस के साथ जाने के लिए तैयार है। राजनीतिक क्षेत्र के जानकार होने का दावा करने वाले कुछ लाल बुझक्कड़ी पंडितों की इस कहानी में कोई सिर पैर ही नहीं था। इसकी वजह थी कि राजेन्द्र शुक्ल मंत्री न बनाए जाने से कतई नाराज नहीं थे। उनके करीबियों को जिस तरह से बड़े ठेके देकर महत्वपूर्ण कार्यों की जवाबदारी दी गई थी ये उनके मंत्री रहते संभव नहीं था.पिछले विधानसभा चुनावों में विंध्य का इलाका एकजुट होकर भाजपा के साथ आया था। शिवराज जी के लंबे कार्यकाल के कारण राजनीतिक मेधा से लबरेज वहां के मतदाताओं में थोड़ी बेचैनी जरूर देखी जा रही थी उन्हें लगता था कि हमारे इलाके को उपेक्षित किया जा रहा है लेकिन जिस तरह के ठोस कार्यों में विंध्य के प्रमुख लोगों को सत्ता का सहोदर बनाया गया उसे जानकर विंध्य के मतदाता में कहीं कोई संशय नहीं बचा है। नारायण त्रिपाठी अलग विंध्य प्रदेश के राजनीतिक नारे को हवा देकर खुद का औचित्य सिद्ध कर रहे थे। ऐसे में कांग्रेस के हवा दिएजाने के बावजूद अलगाव की मांग परवान नहीं चढ़ पाई । इधर विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम ने विंध्य की कमान को मजबूती से थाम रखा है। ऐसे में विंध्य कहीं खिसकने वाला नहीं है।


    बालाघाट और महाकौशल से संवाद करने वाले एक शिल्पी की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। जबलपुर से अजय विश्नोई जिस तरह रह रहकर अपने राजनीतिक वनवास की कराह सुनाते रहे हैं उसे देखकर सात बार के विधायक और लोकप्रिय मंत्री रहे गौरीशंकर बिसेन को मंत्री बनाकर भेजा गया है। महाकौशल को भड़काने और भरमाने के प्रयासों के लिए बिसेन अकेले ही काफी हैं। भाजपा ने हितग्राही मूलक जिन योजनाओं की बौछार पूरे प्रदेश में की है उसका असर महाकौशल में भी पर्याप्त है।


    उमा भारती अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते जिस तरह लोधी वोटों को लामबंद करने में जुटी हैं उसे केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल का अंदरूनी सपोर्ट मिलता रहा है। ऐसे में राहुल लोधी को राज्यमंत्री बनाकर भाजपा ने लोधी समाज की एक बड़ी आकांक्षा पूरी कर दी है।उमा भारती को सत्ता में भागीदारी का संदेश देने में भी ये प्रयास सफल रहा है।


    दरअसल ये तीनों नियुक्तियां न तो मंत्रियों का जलवा बढ़ाने के लिए हैं और न ही उन नेताओं को इस नए पदभार से कोई लाभ मिलने वाला है। उन्हें तो उस ब्रांड असंतुलन को ठीक करने के लिए मैदान में उतारा गया है जो शिवराज सिंह चौहान के चेहरे के अति प्रचार से बिगड़ रहा है। चुनावी प्रचार के केन्द्र में शिवराज सिंह चौहान की छवि को भरपूर उभारा गया है। लगभग 20 सालों की सत्ता ने शिवराज जी को सामने आने का पूरा मौका दिया है। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा की केन्द्रीय कमान ने राज्य भाजपा को भरपूर संसाधन मुहैया कराए हैं। ऐसे में तीन महत्वपूर्ण पदाधिकारियों को मैदान में उतारकर भाजपा हाईकमान ने लड़खड़ाते शिवराज ब्रांड को सहारा देने का जतन किया है। जिस तरह से कहा जा रहा है कि योजनाओं के हितग्राही मिलकर पार्टी को गुजरात जैसी बंपर जीत दिला सकते हैं तो ऐसी स्थिति में शिवराज की आड़ में सत्ता का उपभोग करते रहे लोग इस जीत को शिवराज की जीत बताने में जुट जाएंगे। तब पार्टी को ये चुनावी फील्डिंग काम आएगी।

    बेशक तीनों मंत्री शिवराज के सहयोगी रहे हैं लेकिन राजनीतिक पतंग की डोर यदि थामकर न रखी जाए तो फिर ये मैदान में कोहराम मचाने लगती है। शिवराज जी के कार्यकाल को पार्टी में अलौकिक नहीं माना जाता है। वे मजबूरी का नाम महात्मा गांधी बनकर कार्य करते रहे हैं। ऐसे में तीन मंत्रियों का ब्रेक उनका भ्रम तोड़ने के लिए सहयोगी साबित होगा। शिवराज सिंह जिस लाबी की कठपुतली बनकर सरकार चलाते रहे हैं उसे शिकस्त देने की कोशिश करती कांग्रेस अपने दांत तुड़वा चुकी है। जाहिर है कि भाजपा ये गलती दुहराने वाली तो नहीं है।

  • संसाधन हड़पने वाले खलनायक को कौन कुचलेगा

    संसाधन हड़पने वाले खलनायक को कौन कुचलेगा


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को जगाने का जो प्रयास किया है आज पूरा देश उस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रहा है। प्रधानमंत्री ने आज कोई कलात्मक भाषण की झांकी न देकर जिन तथ्यों और योजनाओं से देश को अवगत कराया है वह भविष्य के हिंदुस्तान की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टिकरण जैसी तीन बुराईयों को समाप्त करने का संकल्प खुलेआम दुहराया और कहा कि मेरा वादा है कि मैं जीवन भर इनसे लड़ता रहूंगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि अगले साल भी मैं लाल किले पर आऊंगा और देश के सामर्थ्य और सफलता का गौरवगान करूंगा। उन्हें देश के प्रमुख विपक्षी दल की विचारधारा पर प्रहार करते हुए कहा कि आजादी के अमृत महोत्सव तक वे केवल बातें करते रहे जबकि हमने सरकार में आकर देश के संकल्पों को साकार कर दिखाया है। दरअसल कांग्रेस जिसे देश की विचारधारा कहती रही है वह एक परिवार के चंद सहयोगी परिवारों को पुष्ट करने का षड़यंत्र रहा है। देश के करोड़ों हाथों को काम देना कोई उपकार की बात नहीं बल्कि मानव बल का सदुपयोग करके उत्पादकता बढ़ाना है। जबकि सर्वाधिक सत्ता संभालने वाली कांग्रेस इसे देश पर उपकार गिनाते नहीं थकती।राजाओं, मुगलों, अंग्रेजों, जमींदारों, साहूकारों, जमाखोरों, मिलावटखोरों से लड़ने का काम देश की आम जनता आगे बढ़कर संभालती रही है लेकिन कांग्रेसी इसे अपना किया अहसान बताने में ही लगे रहते हैं। किसी भी कांग्रेसी से पूछिए वह यही दुहराता है हमने देश को आजादी दिलाई। जबकि हकीकत ये है कि करोड़ों हिंदुस्तानियों ने बलिदान देकर अंग्रेजों को देश से भागने पर विवश किया था। गांधी नेहरू की कांग्रेस ने तो अंग्रेजों को निकल भागने के लिए सुरक्षित पैसेज उपलब्ध कराया और उसका इनाम बटोरा। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच वैमनस्य के बीज बोकर पाकिस्तान बंटवारा स्वीकार करना इसी गहरे षड़यंत्र का हिस्सा था। आजादी के बाद से लेकर जब तक कांग्रेस सत्ता में रही वह केवल फूट डालो राज करो की नीति पर ही अमल करती रही। आज भी देश में कांग्रेस को वोट देने वाला बड़ा तबका इसी तरह वैमनस्य की खेती करके अपना उल्लू सीधा करता है।केवल डेढ़ दो प्रतिशत लोगों को मंहगी सरकारी नौकरियां देकर शेष हिंदुस्तान के विरुद्ध षड़यंत्र की कलई तब खुल रही है जब भारतीय जनता पार्टी ने अंत्योदय के विचार पर अमल करके हर नागरिक को संसाधनों का बंटवारा करने की नीति पर अमल शुरु किया है। दरअसल हमेशा से यही समस्या रही है कि समाज के संसाधनों पर कुछ लोग कब्जा जमा लेते थे। कभी राजा,कभी मुगल, कभी अंग्रेज, कभी जमींदार,साहूकार और आज उन पर कब्जा बेतहाशा बढ़ते सरकारी तंत्र ने जमा लिया है। शोषण का ये कहर इतना अधिक बढ़ गया है कि लोग त्राहिमाम कर उठे हैं। जनता विद्रोह पर उतारू है। वह ये नहीं समझ पा रही है कि उसका असली खलनायक कौन है। कांग्रेस को अपना तारणहार मानने वाला तबका भाजपा को खलनायक बताने में जुटा है । भाजपा पर ये आरोप इसलिए चिपक रहा है क्योंकि लगभग दो दशक तक शासन करने के बाद भी भाजपा जनता के कंधे पर रखा ये जुआ नहीं उतार सकी है। सरकारी नौकरियों का वेतन लगातार बढ़ता जा रहा है और अमीरी गरीबी की खाई भी बढ़ती जा रही है।भाजपा ने अपने समर्थकों को सरकारी नौकरियों में भेज दिया तो शोषण का ये आंकड़ा और बढ़ गया। दिन भर में दो सौ रुपए की मजदूरी पाने वाला श्रमिक दाल,चावल,सब्जी उसी भाव पर खरीद रहा है जिस भाव पर ढाई तीन लाख रुपए मासिक वेतन पाने वाला अफसर खरीद रहा है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पच्चीस लाख रुपए का पैकेज पाने वाले अमीर तबके से तय हो रहा है जबकि गरीब वर्ग बेवजह उसमें पिसा जा रहा है। मोदी जी जब मेरे प्यारे परिवारजन का संबोधन देते हैं को उन्हें और उनकी भाजपा को सोचना होगा कि वह अपने परिवारजनों के लिए मुखिया कैसे साबित हों। कहा गया है मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक, पाले पोसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक । यदि मोदी जी और उनकी भाजपा कांग्रेस की छाया से बाहर नहीं निकल पाएगी और देश के संसाधनों का न्यायोचित बंटवारा नहीं कर पाएगी तो वह लाख बार कांग्रेस के परिवार वाद को गाली देती रहे जनता की समस्याओं का समाधान नहीं हो पाएगा। चंद परिवारों को जरूरत से ज्यादा संसाधन बांटने से उपभोक्ता सामग्री बनाने बेचने वाला कार्पोरेट सेक्टर तो मजबूत होता जा रहा है लेकिन वह सरकार और आम जनता दोनों का धन उलीचता जा रहा है। जनता इससे परेशान है और इससे अमीरी गरीबी के बीच खाई बढ़ती जा रही है। भाजपा ने हितग्राही मूलक योजनाओं से संसाधनों का बंटवारा आम जनता तक पहुंचाने की पहल तो की है लेकिन इसमें भी इतनी सारी शर्तें थोप दी गईं हैं कि वह संसाधन हर व्यक्ति को लाभ नहीं पहुंचा पा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने खुली चुनौती है कि वे हर नागरिक तक देश के संसाधन पहुंचाना सुनिश्चित करें। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की भाजपा भी चीन्ह चीन्ह के रेवड़ी बांटने की शैली पर कार्य कर रही है। जाहिर है कि इससे जन आक्रोश बढ़ेगा और आने वाले विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों में भाजपा को इसकी मंहगी कीमत चुकानी पड़ेगी। संसाधन तो सीमित हैं। कर्ज लेकर बांटने की सीमा भी निश्चित है। जाहिर है कि सरकार को निष्पक्ष होकर शल्यक्रिया करनी होगी। संसाधन रिसकर आम जनता तक पहुंचाने वाला कांग्रेसी मॉडल उसे न केवल छोड़ना होगा बल्कि अंत्योदय की विचारधारा पर अमल की नाटकबाजी छोड़कर सख्ती से अमल शुरु करना होगा। अनुत्पादक सरकारी तंत्र को पालते रहने से वह भले ही चुनावी हेराफेरी करने में थोड़ी हद तक सफल हो जाए लेकिन जन आक्रोश का सैलाब उसे न घर का रहने देगा न घाट का ।

  • पंच परमेश्वर यशोधरा जी की राय पर गौर कीजिए

    पंच परमेश्वर यशोधरा जी की राय पर गौर कीजिए


    तकनीकी शिक्षा और कौशल विकास मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया ने जाने अनजाने में लोकतंत्र की एक बड़ी कमजोरी की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने सिंधिया खेमें के सहयोगी मंत्री डॉ.प्रभुराम चौधरी की आईटीआई खोलने की मांग ठुकराते हुए बड़ी मार्के की बात कही है। वे चाहती तो अपने ही भतीजे के प्रिय सहयोगी की बात मान लेती और वाहवाही बटोर लेतीं, लेकिन उन्होंने जनहित को देखते हुए पंच परमेश्वर बनकर अपनी बात कह डाली। उनकी स्नेहिल फटकार ने पूरे लोकतंत्र और इसके मालिकों को चेतावनी दी है। डॉ.प्रभुराम चौधरी ने ये सोचकर प्रस्ताव रखा था कि राजे तो कृपा बरसाती हैं और वे चुनाव की बेला में एक सफलता की कहानी उन्हें भेंट कर देंगी। वे अपने क्षेत्र में कह सकेंगे कि उन्होंने जनहित में कितने सारे कार्य किए हैं। उनका प्रस्ताव शालीन था उचित था लेकिन विभागीय मंत्री यशोधरा जी ने सच का साथ दिया। वे जानती हैं कि डॉ.प्रभुराम चौधरी तो बदमिजाज डॉ.गौरीशंकर शेजवार की हर चुनौती को सामना कर चुके हैं। उनके बेटे मुदित शेजवार भी जनता की कसौटी पर फिसड्डी साबित हो चुके हैं। इसलिए आईटीआई का शिगूफा गढने की उन्हें कोई जरूरत नहीं हैं। स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए वे भरपूर जनसेवा कर रहे हैं। आईटीआई के संस्थान आज केवल डिग्री बांटने के लिए उपयोगी रह गए हैं। जिन्हें तकनीकी शिक्षा लेकर मिस्त्री, कारपेंटर, मैकेनिक, आदि बनना होता है वे तो निजी तौर पर प्रशिक्षण प्राप्त कर लेते हैं और अपना सेवा कार्य चालू कर देते हैं। सैकड़ों यू ट्यूब चैनल बच्चों को तकनीकी ज्ञान घर बैठे प्रदान करने लगे हैं। ऐसे में आईटीआई से ज्यादा जरूरत उत्पादन के अवसरों की है। रोजगार प्रशिक्षण केन्द्रों में लगभग सारे गुर सिखाए जा रहे हैं। आसपास के जिलों में आईटीआई संस्थान पहले से चालू हैं और उनमें से कई तो उन्नत उपकरणों से भी लैस हैं। करीबी जिले भोपाल में ही तकनीकी शिक्षा के ढेरों संस्थान हैं। जिन्हें वाकई काम धंधा सीखना है वे दिखावे की डिग्री बटोरने में अपना समय थोड़ी बर्बाद करेंगे। भुनभुनाते गौरीशंकर शेजवार जब पार्टी संगठन के प्रति नाराजगी दिखाते हुए गुर्रा रहे हैं तब प्रभुराम चौधरी को ये दूर के ढोल वाली कवायद करने की कोई जरूरत नहीं है। ऐसा करते हुए यशोधरा जी ने शिवराज सरकार की चिंतन प्रक्रिया को भी झिंझोड़ दिया है। बरसों से भाजपा सरकार वही घिसी पिटी पुरानी कांग्रेस की नीति को ढो रही है जिसमें वह शैक्षणिक संस्थानों की घोषणा करती रही है,जबकि आज जरूरत शैक्षणिक ढांचे में मूलभूत सुधार करने की है। यशोधरा जी ने ठीक ही कहा कि यदि आईटीआई खोल देते हैं तो फिर वही ट्रांसफर पोस्टिंग का खेल शुरु हो जाएगा। राजधानी में निवास करने वालों के लिए वह आईटीआई समय काटने का अड्डा बन जाएगा। जहां वे जाना पसंद नहीं करेंगे पर उनका वेतन जरूर खजाने से निकलता रहेगा। दरअसल वक्त कार्पोरेट सेक्टर को अपने पैरों पर खड़ा करने का अवसर देने का है। सरकार की आर्थिक हालत खस्ता है टैक्स और अन्य साधनों से उसकी आय बढ़ी है इसके बावजूद वह सरकारी अमले का वेतन भत्ता अपनी आय से नहीं निकाल पा रही है। वेतन के लिए भी उसे इसकी टोपी उसके सिर वाली कवायद करनी पड़ती है। कर्ज जनता के सिर लदता जा रहा है। आज जब एक शिक्षक पूरे देश के बच्चों को बेहतर शिक्षा टीवी कंप्यूटर मोबाईल के माध्यम से दे सकता है तब दिखावे के संस्थान खड़े करने का कोई औचित्य नहीं है। जरूरी है कि आय के उपक्रम खड़े किए जाएं। केन्द्र सरकार का सूक्ष्म एवं लघु उद्योग मंत्रालय उद्यमियों को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान चला रहा है। ऐसे में कांग्रेसी औद्योगिकीकरण की असफल विचारधारा को ढोना फिजूल है। आप डिग्री देंगे और युवा नौकरी पाएंगे इससे बेहतर है कि वे काम सीखें और देश के लिए पूंजी का निर्माण करें। यशोधरा जी का यह संदेश पूरे राजनेताओं को समझना होगा। खासतौर से शिवराज सरकार की पैरवी करने वाले महान चिंतकों को भी इस विषय पर गौर करना चाहिए।

  • इस खाई को कितना भर पाएगा अंत्योदय का विचार

    इस खाई को कितना भर पाएगा अंत्योदय का विचार


    देश में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन को दीनदयाल अंत्योदय योजना के नाम से जाना जाता है। लगभग एक दशक से ज्यादा पुरानी इस योजना का इतिहास इससे भी ज्यादा पुराना है।आजादी के बाद से सरकारें लगातार गरीबी दूर करने के कार्यक्रम चलाती रहीं हैं। इनके लिए वैश्विक कर्जदाताओं से साफ्ट लोन भी लिए जाते रहे हैं। यदि ये सभी अभियान सफल हो गए होते तो भारत काफी साल पहले विकसित देशों की सूची में शामिल होकर चहुंमुखी विकास की होड़ में शामिल हो चुका होता। अपने लंबे अनुभवों से कांग्रेस की निवृत्तमान सरकारों ने पाया कि नौकरशाही इस अभियान की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। गरीबी दूर करने के लिए सरकारों ने जो संसाधन भेजे वे भ्रष्ट नौकरशाही की भेंट चढ़ गए। इस समस्या से निपटने के लिए कांग्रेस ने पंचायती राज जैसा मूर्खतापूर्ण उपाय ढूंढ़ा था। जो अपनी स्थापना से लेकर कभी सफल नहीं हो सका है। दिग्विजय सिंह की सरकार ने तो पंचायती राज को इतना पावरफुल बना दिया कि गांव गांव में सरपंच,सचिवों और उनकी मंडलियों ने लूट का कोहराम मचा दिया। सत्ता से समानांतर तंत्र खड़ा कर दिए जाने से नौकरशाही खफा हो गई। जनता को तब तक ये नहीं मालूम था कि नौकरशाही और पंचायती राज में असली अपराधी कौन है। जन आक्रोश पंचायती राज के खिलाफ था तो लोग उमा भारती की जन क्रांति में शामिल हो लिए और भाजपा की मजबूत सरकार सत्ता में पहुंच गई। बाद की भाजपा सरकारों ने नौकरशाही से पंगा नहीं लिया और कहानी जस की तस चलती रही। कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने इंसपेक्टरराज लौटाकर नौकरशाही को सब्जबाग दिखाए थे। वह तो भाजपा के रणनीतिकारों और ज्योतिरादित्य सिंधिया की आपसी समझबूझ थी जो करप्टनाथ के षड़यंत्र का भांडा बीच राह में ही फूट गया। इस बार फिर एक बार जनता को समाधान देने में असफल नौकरशाही निशाने पर है। कमलनाथ ने जिस नौकरशाही को सत्ता में आते ही धोबी का कुतका बना दिया था वे आज उसी नौकरशाही के सामने दाना डाल रहे हैं। क्योंकि उन्हें कांग्रेस के संगठन से ज्यादा भरोसा नौकरशाही के भ्रष्टाचार की शैली पर है। हालांकि सोशल मीडिया का चहुंमुखी विकास और संचार के बेहतर साधनों के बीच इस बार कमलनाथ की नाव वहीं डगमगाने लगी है जहां से उसने अपनी यात्रा शुरु की थी। भाजपा के रणनीतिकारों ने एकात्म मानवता वाद के प्रणेता पंडित दीन दयाल उपाध्याय के अंत्योदय वाले फार्मूले को मैदान में उतार दिया है। उन्होंने भ्रष्ट नौकरशाही से तो पंगा नहीं लिया लेकिन जनता को हितग्राही मूलक योजनाओं से भरपूर लाभ पहुंचाया। उसकी लाड़ली बहना योजना ने तो रिकार्ड सफलता अर्जित की है। इस योजना के दूसरे चरण को अधिकारी ये कहकर असफल बनाने में जुटे हैं कि सरकार ने योजना का लाभ लेने के लिए घर में टै्क्टर होना अनिवार्य शर्त बना दिया है। इस तरह नौकरशाही इस योजना की राह में अड़ंगे लगा रही है। ये कहा जा रहा है कि लाड़ली बहनों को देने लायक धन आखिर सरकार लाएगी कहां से। फिर जब उसने भविष्य में तीन हजार रुपए मासिक देने का वायदा किया है तो ये धन आखिर आएगा कहां से। भाजपा ने तो नौकरशाही कोसत्ता की बागडोर थमा रखी थी लेकिन भ्रष्ट अफसरों ने अपनी बदमाशी का ठीकरा भाजपा पर ही फोड़ना शुरु कर दिया। भाजपा के नेतागण खुलकर अपनी बात नहीं कह पाए और आज वे लाड़ली बहना योजना की सफलता का भरोसा भी नहीं दिला पा रहे हैं। कांग्रेस की नकल करते और अफसरशाही पर निर्भर भाजपाईयों की स्वतंत्र चेतना विलीन सी हो गई है। वे जनता को नहीं समझा पा रहे हैं कि उनके कार्यकाल में विकास के क्या क्या प्रतिमान गढ़े गए हैं। उसने लाड़ली बहना योजना, किसान सम्मान निधि,प्रधानमंत्री आवास, युवाओं को लैपटाप जैसी योजनाओं से नौकरशाही और सत्ता के विरुद्ध विद्रोह की आंधी को लगभग रोक दिया है। हालांकि ये अभी केवल अर्धविराम है।सत्ताधीशों को ये जान लेना चाहिए कि कांग्रेस के बनाए जिस ढांचे पर भाजपा अब तक चलती रही है वह ढांचा ही आक्रोश की असली वजह है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कार्य करते हुए जाना कि कांग्रेस अंग्रेजों की फूट डालो राज करो की नीति पर चल रही है। ये चंद लोगों को साथ लेकर बहुसंख्यक जनता को कुचलने वाली अंग्रेजों की ही रणनीति अपनाए हुए है। तब उन्होंने वसुधैव कुटुंबकम की भावना में रचे बसे एकात्म मानवतावाद का सिद्धांत दिया। जिसमें समाज के हर व्यक्ति को परिवार का सदस्य मानकर उसे मजबूत बनाने का लक्ष्य रखा गया था। अंत्योदय इसी से उपजा विचार था जिसमें समाज के दबे कुचले पिछड़े,दलित वर्ग को साथ लेकर चलने का लक्ष्य था। शिवराज सिंह सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल में नौकरशाही को छूट दी लेकिन अब जब चुनाव की बेला नजदीक आ गई है तब वह अंत्योदय के सहारे जनता के आक्रोश को नई दिशा में धकेलने का प्रयास कर रहे हैं। नौकरशाही ने अपनी लापरवाही, अनिच्छा, अपना घर भरने के लालच और शोषणवादी मानसिकता से जनधन की खूब लूट मचाई है। जनता शोषण से उसी तरह त्रस्त है जैसे कभी मुगलों, अंग्रेजों, जमींदारों, राजदरबारों, सूदखोरों से त्रस्त रही है,और वह लगभग विद्रोह पर उतारू है।कानून और व्यवस्था दूर के ढोल बने हुए हैं। ऐसे में लाड़ली बहना योजना जैसे कदम उसकी नाराजगी पर ठंडा पानी छिड़कने का काम कर रहे हैं।उन योजनाओं का असर भी हुआ है लेकिन कितना अभी ये कहना जल्दबाजी होगी।

  • कुबेरेश्वर धाम से अब साल भर बंटेंगे रुद्राक्ष

    कुबेरेश्वर धाम से अब साल भर बंटेंगे रुद्राक्ष

    सीहोर में पंडित प्रदीप मिश्रा की कथा सुनने पहुंचा करोड़ों श्रद्धालुओं का रेला सनातन धर्म का जयकारा लगा रहा है।  बीस लाख लोगों ने पहले ही दिन लगभग पांच लाख अभिमंत्रित रुद्राक्ष प्राप्त कर लिए थे। प्रशासन और खुद आयोजकों को भी भरोसा नहीं था कि उनका आयोजन इतना सुपर हिट होगा। भोपाल इंदौर मार्ग पर लगे कई किलोमीटर लंबे जाम को देखते हुए आयोजकों ने फिलहाल रुद्राक्ष वितरण रोक दिया है। जनता की आस्था को देखते हुए अब ये रुद्राक्ष साल भर बांटे जाएंगे। इस विशाल आयोजन की सफलता पर तरह तरह की अटकलें लगाई जा रहीं हैं। कई सयाने इसे पाखंड और सरकार का वोट बटोरने का अनुष्ठान बताने में जुट गए हैं। उनका आरोप है कि पाखंडी बाबाओं की तरह पंडित प्रदीप मिश्रा भी जनता को बरगला रहे हैं। वे कहते हैं कि रुद्राक्ष का पानी पीने से कैंसर जैसे रोग भी ठीक हो जाते हैं। इस तरह के कई आरोप कथावाचक पर चिपकाने का प्रयास किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि वे सरकार के लिए वोटों की खेती कर रहे हैं इसलिए भाजपा सरकार उनके आयोजन को बढ़ावा दे रही है। सरकार से वेतन और सुविधाएं प्राप्त करने वाले कथित सुधारवादी इसके लिए आयोजक और शासन को कटघरे में खड़ा करने का बचकाना प्रयास कर रहे हैं। इसके विपरीत लोगों की आस्थाएं परवान चढ़ती जा रही हैं। दूसरे दिन भी श्रद्धालुओं का सीहोर पहुंचना जारी रहा है। प्रशासन ने भोपाल इंदौर हाईवे खुलवा दिया है लेकिन कोसने वाले कई तरह की अफवाहें फैला रहे हैं। आयोजन में पहुंचे बीस लाख लोगों में से दो महिलाओं और एक बच्चे ने अपने स्वास्थ्य कारणों से दम तोड़ दिया तो कुछ लोगों ने ये कहना चालू कर दिया कि अव्यवस्था की वजह से इन लोगों का निधन हुआ है। जबकि हकीकत ये है कि आयोजकों ने लाखों लोगों के भोजन की व्यवस्थाएं की हैं। भीड़ की वजह से पानी के टैंकर नहीं पहुंच पा रहे हैं तो आसपास के नलकूपों से पाईप डलवाकर पानी पहुंचाया जा रहा है।इस तरह के कई उपाय किए जा रहे हैं कि दूरदराज से और अन्य प्रांतों से आने वाले लोगों को भी कोई परेशानी न हो। ये लोग मध्यप्रदेश के वोटर नहीं हैं।कथा सुनने के लिए पहुंचने वाले सभी श्रद्धालु भाजपाई कार्यकर्ता नहीं हैं। कुछ तो कट्टर कांग्रेसी भी हैं। इसके बावजूद ये सभी सनातन धर्म की उस धारा में स्नान करने पहुंच रहे हैं जो सबके सुखी और स्वस्थ होने की कामना करती है। कुबेर को यक्षों का राजा माना जाता है। वे स्थायी धन के देवता भी हैं। लक्ष्मी जहां चंचला होती है वहीं कुबेर स्थायी संपदा के प्रतीक हैं। पंडित प्रदीप मिश्रा अपनी कथाओं में जिस नजरिए से सनातन धर्म को समझाने का प्रयास करते हैं उनसे लोग धर्म को आज के संदर्भ में समझ पा रहे हैं। यही वजह है कि लोग अपने अपने इंतजाम करके अपने वाहनों से सीहोर पहुंच रहे हैं पर ये सभी सुविधाएं सभी के पास नहीं हैं । ऐसे में लोग ट्रेनों और बसों से भी कुबेरेश्वर धाम पहुंच रहे हैं। इस सफल आयोजन से किनके पेट में दर्द हो रहा है और क्यों ये जानकर असली षड़यंत्रकारियों की पहचान करना सरल हो जाता है।

    पंडित प्रदीप मिश्राःसनातन को सरल बनाकर किया पाखंडियों को बेनकाब

    दरअसल पंडित प्रदीप मिश्रा सनातन को सरल भाषा में समझा रहे हैं वे कह रहे हैं कि ईश्वर के प्रति आस्था प्रकट करने के लिए आपको ढपोरशंखियों के जंजाल में उलझने की जरूरत नहीं हैं। आप अपने घर में भी भोले का अभिषेक कर सकते हैं।इससे खासतौर पर वे पंडित और नकली ब्राह्मण खासे नाराज हैं जो अपने जजमानों की जेब से चढ़ावा निकलवाने के लिए ऊटपटांग उपाय सुझाते रहते हैं। ऐसे लोग  वास्तव में सनातन को भौतिकवादी पाखंडों में घसीट रहे हैं। ऐसे में पंडित प्रदीप मिश्रा का मार्गदर्शन उन्हें सनातन की महिमा समझने का अवसर दे रहा है। गुरु और शिष्यों के बीच का ये प्रेम अद्भुत है। वे गुरु कथाओं में अपने आसपास के उदाहरणों से लोगों को पाखंड के दलदल से बाहर निकाल रहे हैं। संघ और भाजपा ने जबसे सनातन और हिंदुत्व की चमचमाती आभा को पाखंड के पर्दे से बाहर लाने का अभियान चलाया है तबसे सुधारवादी कथावाचक और साधु संतों को सनातन के प्रति खोया सम्मान जगाने में सरलता होने लगी है। परेशानी तो उन पाखंडियों को हो रही है जिन्होंने भोली भाली जनता को जातियों में बांटकर वैमनस्य की खेती की है। धर्म की दीवारें खींचकर उन्हें एक दूसरे के विरुद्ध बरगलाया है। समाज को बड़ी संख्या में मनोवैज्ञानिकों की जरूरत है जो लोगों का मार्गदर्शन कर सकें। ऐसे में पंडित प्रदीप मिश्रा जैसे कथावाचक दीपक बनकर लोगों का मार्ग निष्कंटक बना रहे हैं। कुबेरेश्वर धाम में बंटने वाले रुद्राक्षों के प्रति लोगों का अनुराग देखकर आयोजकों ने अब साल भर रुद्राक्ष बांटने की व्यवस्था कर दी है। जाहिर है इससे रुद्राक्ष पाने के लिए भगदड़ की कोई जरूरत नहीं रह गई है। हर श्रद्धालु को रुद्राक्ष मिलेगा और कथाओं से निकला ज्ञान पुंज उनके जीवन में स्थायी सुख समृद्धि और स्वास्थ्य का श्रीगणेश करेगा।

  • पीएफआई पर प्रतिबंध पर्याप्त नहीं

    पीएफआई पर प्रतिबंध पर्याप्त नहीं


    पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के ठिकानों पर राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण(एनआईए) के छापों ने देश में राजनैतिक रूप से गुमराह तबके की असलियत को उजागर कर दिया है। ये कड़वी सच्चाई है कि लगभग एक सौ तीस करोड़ की आबादी के विशाल हिंदुस्तान में बड़ा तबका आज भी मूलभूत जरूरतों के लिए जद्दोजहद कर रहा है। केन्द्रीय मंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भी स्वीकार किया है कि भारत धनवान देश है लेकिन यहां की जनता गरीब है, लोग बेरोजगारी और भुखमरी से जूझ रहे हैं। यहां आज भी जातिवाद, अस्पृश्यता और मंहगाई ने लोगों का जीवन दूभर कर रखा है। उनकी इस स्वीकारोक्ति के बावजूद ये भी सच्चाई है कि देश की अधिसंख्य आबादी अपना जीवनस्तर सुधारने की हरसंभव कोशिशें कर रही है। इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपना जीवन संवारने के लिए आतंक से आधिपत्य का रास्ता चुनने का ख्वाब देख रहे हैं। इन पर प्रहार समय की मांग है। एनआईए और तमाम सुरक्षा एजेंसियों ने बड़ी कुशलता से पीएफआई के अड्डों पर छापों में और स्लीपर सेल से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया है। पीएफआई के सहयोगी संगठनों और राजनैतिक विंग सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आफ इंडिया (एसडीपीआई) में भी सक्रिय लोगों की गिरफ्तारियां हुईं हैं। लंबी छानबीन के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने जो तथ्य जुटाए हैं उनकी वजह से छापों की अहमियत बढ़ गई है। ये भी तय है कि सबूतों के आधार पर पकड़े गए लोगों की सजा अभी से मुकर्रर हो गई है। साक्ष्य इतने अकाट्य हैं कि आतंक और विद्रोह का जाल फैलाने वालों का शेष जीवन अब जेलों में ही कटेगा। इन तथ्यों की जानकारी अभी देश के लोगों को नहीं है यही वजह है कि एनआईए के छापों को लोग राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं। न केवल मुसलमानों बल्कि उन्हें अपना वोट बैंक मानने वाले लालू प्रसाद यादव और मायावती जैसे नेताओं ने भी छापों पर नाराजगी जताना शुरु कर दिया है। मुस्लिम समुदाय के ज्यादातर व्यक्ति यही कहते सुने जा रहे हैं कि भाजपा और खासतौर पर आरएसएस के इशारे पर ये कार्रवाई अपने विरोधियों को कुचलने के लिए की गई है। जबकि हकीकत ये है कि विदेशों से करोड़ों रुपयों का धन गरीबों के कल्याण के नाम पर लाया जा रहा था और उसका इस्तेमाल आतंकी वारदातों को अंजाम देने के लिए किया जा रहा था। ये कहा जाता था कि अरब देशों की तेल समृद्धि का बड़ा हिस्सा जकात के नाम पर देश को मिलता है। धर्म के प्रचार प्रसार के लिए भी अरब देशों से जो धन आता है उससे गरीब मुस्लिम आबादी का कल्याण किया जा रहा है। ये बात ऊपरी तौर पर सही भी नजर आती है। देश भर में खुले मदरसों के माध्यम से जो धार्मिक शिक्षा दी जाती है उससे कई प्रतिभाशाली बच्चे भी सामने आते हैं लेकिन वे तो तब भी उभरते जब उन्हें देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा मिली होती। ईसाईयों ने भी शिक्षा में जो निवेश किया है उससे भी दुनिया के लिए अच्छे पेशेवर मिले हैं। इसका मतलब ये तो नहीं कि वे आतंक की नर्सरी भी बन गए। एनआईए को मदरसों और जकात की आड़ में आतंकियों को फंडिंग किए जाने के जितने स्पष्ट सबूत मिले हैं उससे साफ जाहिर होता है कि भारत जैसे विशाल बाजार पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए दुनिया की कई शक्तियां किस तरह देश को गृह युद्ध की ओर धकेल रहीं हैं। इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक एंड सीरिया यानी आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन देश की तरुणाई को गुमराह करने के लिए क्या क्या हथकंडे अपना रहे हैं इसके भी सबूत एनआईए के हाथ लगे हैं। स्कूल, कालेजों के परिसरों में कैंपस फ्रंट आफ इंडिया( सीएफआई) और नेशनल वीमेंस फ्रंट( एनडब्ल्यूएफ) के माध्यम से कैसे बच्चों को साफ्ट टारगेट के रूप में गुमराह किया जाता है ये भी चिंताजनक है। यही वजह है कि सबूतों को देखते हुए मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा अपनी नाराजगी तो जता रहा है लेकिन उसने इस कार्रवाई में कोई व्यवधान नहीं डाला है। भारत के मुसलमान प्रगतिशील माने जाते हैं। यही वजह है कि दुनिया के आतंकी संगठन भारत के मुसलमानों पर भरोसा नहीं करते हैं। मुस्लिम आतंकियों के निशाने पर रहने वाले आरएसएस को भी भारत के मुसलमान अब तिरछी निगाह से नहीं देखते हैं। उन्हें ये तो पता है कि आरएसएस हिंदुत्व की विचारधारा का समर्थन करता है लेकिन वे ये भी जानते हैं कि हिंदुत्व की विचारधारा सर्वपंथ समभाव के घोषित विचार पर कार्य करती है। आरएसएस ने कभी मुस्लिम धर्म को न तो नकारा है न ही उस पर कोई प्रहार किया है। भारत में मुसलमान आज भी अपनी योग्यता के बल पर ऊंचाईयां छू सकता है। यही वजह है कि भारत में आतंक के पर फैलाने का प्रयास टांय टांय फिस्स हो गया है। अब सरकार को सोचना होगा कि आखिर वे क्या वजहें थीं जिसके चलते लोग भारत की साम्प्रदायिक एकता में सेंध लगाने की जुर्रत भी करते हैं। मोदी सरकार ने कई मूलभूत समस्याओं पर प्रहार किया है। इसके बावजूद सरकार के आंख,नाक, कान ,हाथ और पैर जिस तंत्र पर टिके हैं उनकी कार्यक्षमता लगभग शून्य है। मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री कमल पटेल ने तो सार्वजनिक तौर पर कहा है कि हम दो लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था में से साठ हजार करोड़ रुपए केवल तनख्वाह बांटते हैं इसके बावजूद सरकारी तंत्र जन समस्यायों के निराकरण की जवाबदारी नहीं निभा पा रहा है। सरकार ने जो हितग्राही मूलक योजनाएं बनाई हैं उनका लाभ भी जनता को नहीं मिल पा रहा है। लगभग अठारह साल से काम कर रही शिवराज सिंह चौहान सरकार अब तक इसी सरकारी तंत्र के सहारे अपने राजनैतिक उद्देश्य पाने का प्रयास करती रही है। उसके मंत्री विधायक और कार्यकर्ता बार बार चेताते रहे हैं कि सरकारी अफसर जनता की योजनाओं को लागू नहीं कर रहे हैं लेकिन इस तंत्र ने पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं को योजनाओं की रिश्वत देकर खामोश कर दिया। आज जब चुनाव की बेला आ रही है तब भाजपा के नेतागण अपनी अक्षमता और असफलता का ठीकरा अफसरशाही पर थोप रहे हैं। इससे जनता की समस्याओं का समाधान कैसे हो सकेगा। मोदी सरकार भी यदि यही शैली अपना ले तो जाहिर है कि जनता को अपनी जरूरतों के लिए अन्य साधनों की ओर रुख करना होगा। आतंकी साजिशों ने भारत की इसी कमजोरी का फायदा उठाने की चेष्ठा की है। इसका अर्थ ये भी हुआ कि सरकार भले ही अपनी सुरक्षा एजेंसियों के सहारे आतंक के साजिशकर्ताओं को पकड़कर जेलों में ठूंस दे लेकिन दहशत फैलाने की ये परंपरा बंद नहीं होगी। भारत की अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी डॉलर के आयात पर निर्भर होती है। सरकार का प्रयास भी होता है कि किसी भी बहाने डॉलर देश में आते रहें । यही कारण है कि कल्याणकारी गतिविधियों के लिए विदेशों से धन लाने वालों को सरकार टैक्स में भी राहत देती है। अब यदि उस धन का इस्तेमाल आतंकियों गतिविधियों के लिए किया जाने लगे तो भारत की विकास प्रक्रिया षड़यंत्रों की भेंट चढ़ जाएगी। इसे रोकने के लिए एनआईए ने जो कार्रवाई की है उसका समर्थन किया जाना चाहिए। इसके साथ साथ ये भी जरूरी है कि सरकार पूरी पारदर्शिता से अपनी विकास प्रक्रियाएं चलाए जिससे असंतोष को जड़ें जमाने का अवसर न मिले। आरएसएस और भाजपा को अपने कार्यकर्ताओं का भी प्रशिक्षण इस तरह से करना चाहिए ताकि वे अपनी भड़काऊ बयानबाजियों से लोगों को विद्रोह का मार्ग अपनाने के लिए मजबूर न करें। पीएफआई पर प्रतिबंध पर्याप्त नहीं है इससे आगे बढ़कर हमें एक ऐसी विचारधारा का सूत्रपात करना होगा जो न केवल भारत बल्कि विश्व में भी मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे।

  • अफसरशाही की गर्राहट

    अफसरशाही की गर्राहट


    आदिवासियों को कुत्ता कहकर उनकी औकात बताने वाले एसपी अरविंद तिवारी को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हड़बड़ाहट में हटा दिया है। झाबुआ के कलेक्टर सोमेश मिश्रा को भी हटाया गया है। उन पर आरोप था कि वे सरकारी योजनाओं की डिलीवरी नहीं कर पा रहे थे। पिछले विधानसभा चुनावों में आदिवासियों की नाराजगी से भाजपा अपनी सरकार खोने का दंश झेल चुकी है। इस बार भी भाजपा चिंतित है। यदि आदिवासियों के आक्रोश को न थामा गया तो उसे इस बार भी सरकार बनाना कठिन हो जाएगा। आदिवासी ही नहीं भाजपा के सबसे बड़े जनाधार पिछड़ा वर्ग की बेचैनी भी भाजपा के लिए चिंता का सबब बनी हुई है। पिछले चुनाव में ब्राह्रण मतदाताओं ने जिस तरह अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए भाजपा से विद्रोह किया वह भी भाजपा के लिए भय की एक वजह बनी हुई है। यही कारण था कि भाजपा ने ब्राह्मण अफसरों ,नेताओं और ठेकेदारों को भरपूर लूट की छूट दी। अब भाजपा इस मुहाने पर आ गई है जहां सभी तबके उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं। कमलनाथ कांग्रेस विद्रोह की इस खेती को करने में पूरी शिद्दत से जुटी हुई है।हालत ये है कि कमलनाथ राहुल गांधी की पदयात्रा और विधानसभा जैसे मौकों में भी उलझने से बच रहे हैं। भाजपा की स्थिति भई गति सांप छछूंदर जैसी हो गई है। तमाम हितग्राही मूलक योजनाएं बनाने और कांग्रेस से जनता की सहज नफरत के बावजूद भाजपा को चुनावी दौड़ में हांफी आ रही है।मध्यप्रदेश के शासकों की अकुशलता इसकी सबसे बड़ी वजह रही है।शिवराज सरकार को लगभग अठारह साल काम करने का मौका मिला। अथाह बहुमत ने उन्हें भरपूर आजादी दी। इसके बावजूद उनकी सरकार अब तक जनता की कसौटी पर खरी नहीं उतर पाई है। दिग्विजय सिंह की भ्रष्ट सरकार 2003 में सत्ताच्युत हुई थी। उन्होंने पंचायती राज के माध्यम से सत्ता के समानांतर तंत्र खड़ा करने का असफल प्रयास किया था। वह प्रयास बुरी तरह औंधे मुंह गिरा। इसकी पृष्ठभूमि में पंचायतों और प्रतिनिधियों का भ्रष्टाचार प्रमुख वजह रही थी। अफसरशाही को उन्होंने जिस तरह गली का कुत्ता बनाया उससे अफसरशाही ने भाजपा के प्रतिनिधि बनकर उमा भारती की सरकार को रिकार्डतोड़ सफलता दिलाई थी। उमा भारती ने तो अफसरशाही को उत्पादकता के लिए कसा लेकिन उनके बाद बाबूलाल गौर और फिर शिवराज दोनों ने अफसरशाही के इस अहसानों के बदले में सत्ता की बागडोर उसे ही थमा दी। शुरु से भाजपा के नेता और मंत्री बोलते रहे हैं कि अफसर उनकी नहीं सुनते। वे जो प्रस्ताव अफसरों के पास बनाकर देते हैं उन्हें वे रद्दी की टोकरी में फेंक देते हैं। भाजपा के नेताओं का ये दर्द सही था और आज भी बरकरार है। अफसरशाही ने शिवराज के कार्यकाल में जो मलाई कूटी है उसे अफसरों पर पड़े छापों और रंगे हाथों पकड़े गए अफसरों की संख्या देखकर आसानी से समझा जा सकता है। भाजपा ने खुद अफसरशाही की गोदी में बैठकर हितग्राही मूलक योजनाओं का भरपूर लाभ उठाया है। अपने कार्यकर्ताओं को दोनों हाथों में लड्डू थमाए। संघ के नाम पर तो चिरकुटों तक ने सरकारी खजाने को मनचाहे ढंग से उलीचा। अफसरशाही और भाजपा की इस लूट में जनता उपेक्षित होती रही। यदा कदा जनता के बीच भी योजनाओं का लाभ पहुंचा जिससे असंतोष अब तक हिंसक विद्रोह का रूप नहीं ले सका है।लोगों को अब भी लगता है कि शायद कभी उनकी भी लाटरी लग जाए, जो अब संभव नहीं है। कमलनाथ इसी असंतोष को उभारने का जतन कर रहे हैं। दिल्ली के बाद पंजाब में आप पार्टी ने भाजपा की धन बटोरने वाली शैली को मुफ्त बिजली के वादे से धराशायी किया है। राहुल गांधी भी अपनी यात्रा में भाजपा को अडानी अंबानी की सरकार कह रहे हैं।कांग्रेस वैसे भी पूंजीपतियों को शैतान बताकर उन पर कंकर फेंककर तालियां बजवाती रही है। कांग्रेस का ये पुराना तरीका उसे एक बार फिर जीवन दे रहा है। भाजपा के नेतागण असहाय हैं वे अपने लिए धन जुटाने वाले अफसरों उद्योगपतियों और ठेकेदारों पर आखिर कैसे प्रहार कर सकते हैं। झाबुआ के कलेक्टर एसपी को हटाकर शिवराज सिंह ने आदिवासियों को खुश करने का फौरी प्रयास किया है। भाजपा के मुख्यमंत्री जिनमें शिवराज सिंह चौहान सबसे अव्वल हैं वे चोरी छिपे मोदी सरकार की नीतियों को जन असंतोष की वजह बताते रहे हैं। ये बात बहुत हद तक सही भी है। मोदी सरकार ने टैक्स वसूलने और सब्सिडी बंद करने में जो तेजी दिखाई है उससे जनता में असंतोष फैला है। इसके बावजूद शिवराज सिंह चौहान और अन्य राज्यों की सरकारें जनता को इन बदली परिस्थितियों के बीच जिंदा रहने की कला नहीं सिखा पाई हैं। कांग्रेस की मुफ्तखोरी वाली राजनीति को बंद कभी न कभी तो होना ही था लेकिन भाजपा ने अधूरे प्रहार किए हैं। वह न तो मुफ्तखोरी की नीतियां पूरी तरह बंद कर पाई है और न ही जनता को धन बनाने की कला सिखा पाई है। जाहिर है इससे असंतोष बढ़ रहा है। उस पर झाबुआ एसपी अरविंद तिवारी की नशे में धुत्त बदतमीजी और प्रशासनिक अकुशलता की वजह से कलेक्टर सोमेश मिश्र ने आदिवासियों के असंतोष को हवा दे दी है। जाहिर है मुख्यमंत्री ने मजबूरी में उन्हें हटाया है। सोमेश मिश्र ने कलेक्टरी से पहले आयुष्मान मिशन के सीईओ की जवाबदारी संभाली थी। कलेक्टरी भी उन्हें इनाम के तौर पर मिली थी। जब भाजपा की शिवराज सरकार अफसरों की मैदानी पोस्टिंग उपकृत करने के अंदाज में करती रही है तो फिर अफसर मैदान में जाकर अपना करिश्मा आखिर क्यों न दिखाएंगे। जाहिर है मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार को अपने किए कर्मों का फल मिलना शुरु हो गया है। भाजपा की अकुशलता कांग्रेस के लिए भाग्य से छींका टूटने वाली साबित हो रही है। पिछले चुनाव में भी कांग्रेस के भाग्य से छींका टूटा था उसने सत्ता में आकर यही लूट का दौर चलाया था। अब यदि जनता भाजपा से नाराज होती है तो उसे एक बार फिर कमलनाथ जैसा नागनाथ सौगात में मिलेगा।अफसरशाही तो मदमस्त है ही।

  • बेअसर रही पिछड़ा वर्ग का वोट बैंक छीनने की राजनीति

    बेअसर रही पिछड़ा वर्ग का वोट बैंक छीनने की राजनीति


    अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति का अनुसरण करने वाली कांग्रेस पार्टी इन दिनों मध्यप्रदेश में इसी पुरातन फार्मूले का प्रयोग कर रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में कमलनाथ कांग्रेस ने आदिवासियों को बरगलाकर सत्ता पाने में जो सफलता पाई थी उससे उत्साहित होकर उन्होंने इस बार पिछड़ों को निशाना बनाया है। पिछड़ा वर्ग के इस बड़े वोट बैंक की खेती करने की शुरुआत वैसे तो कांग्रेस की अर्जुनसिंह सरकार ने की थी लेकिन उसे परिणाम मूलक बनाने का काम भारतीय जनता पार्टी ने किया । पिछड़ा वर्ग से ही लगातार तीन मुख्यमंत्री देकर भाजपा ने इस बड़े वोट बैंक को संवारने में सफलता पाई है। इस मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाने की हसरत पाले कमलनाथ कांग्रेस ने कानूनी दांव पेंच से अपनी पार्टी को जिस तरह पिछड़ों का हितैषी बताने का अभियान चलाया उसने राज्य की राजनीति में भारी भूचाल मचा दिया। कई दिनों तक लगता रहा कि पिछड़ों की ये पैरवी कांग्रेस को बड़ा जनाधार दिलवाएगी। कमलनाथ के इस दांव के सूत्रधार राज्यसभा सांसद विवेक तनखा बने। उन्होंने कमलनाथ के मीडिया प्रभारी सैय्यद जाफर और अन्य की याचिकाओं को लेकर अदालती लड़ाई लड़ी। विशेष विमान से इन योद्धाओं को सुप्रीम कोर्ट भेजा गया और बड़ी धनराशि खर्च करके अदालत में पिछड़ों को आरक्षण की रोटेशन प्रणाली का पालन करवाने की पैरवी की गई। ये दांव उल्टा पड़ा और अदालत ने इसे फेब्रिकेटेड मानते हुए खारिज कर दिया। रिपट पड़े की हर गंगे करने वाले कमलनाथ ने सरकार पर दबाव बनाना शुरु कर दिया कि वह पिछड़ों को आरक्षण दिलाने के लिए अदालत जाए। विधानसभा में जो स्थगन प्रस्ताव लाया गया उसमें कांग्रेस ने सरकार पर आरोप लगाने की कोशिश की थी कि वह पिछड़ों को आरक्षण का लाभ न देकर पंचायतों के जो चुनाव करवा रही है उससे प्रदेश के एक बड़े वर्ग के हितों की अनदेखी होगी। कमलनाथ और उनकी चिल्लर पार्टी ने सदन में जिस तरह इस मुद्दे को उठाया उससे तो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए विधायकों मंत्रियों को भी एकबारगी लगा कि सरकार पर किया जा रहा ये वार बहुत घातक साबित होगा। पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, उनके सहयोगी गृहमंत्री डाक्टर नरोत्तम मिश्रा और नगरीय विकास एवं आवास मंत्री ठाकुर भूपेन्द्र सिंह ने जिस तरह इस राजनीतिक वार का डटकर सामना किया उससे विपक्ष की धार भौंथरी हो गई। भूपेन्द्र सिंह जो कि स्वयं पिछड़ा वर्ग से आते हैं उन्होंने कहा कि यदि हमारी सरकार पर लगाए जा रहे आरोपों में थोड़ी भी सच्चाई हुई और मैंने जिन कानूनी प्रक्रियाओं का हवाला दिया है उनमें यदि कोई झूठी साबित हुईं तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा। पिछड़ा वर्ग के हित के लिए मैं जान देने को भी तैयार हूं। कमलनाथ ने सदन में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर दबाव बनाया कि वे पिछड़ा वर्ग को लेकर जो दावे कर रहे हैं उसके लिए उनकी सरकार को अदालत जाकर आरक्षण सुनिश्चित करना चाहिए। मुख्यमंत्री ने विपक्ष के आरोपों पर तीखे हमले किए। उन्होंने कहा कि भाजपा ने पिछड़े वर्ग से लगातार तीन मुख्यमंत्री देकर इस वर्ग को जितनी नौकरियां दी हैं या अन्य लाभ दिलाए हैं उन्हें वे सदन के पटल पर रखने को तैयार हैं। हमने पिछड़े वर्ग को सत्ता का लाभ दिलाने का पाखंड नहीं किया बल्कि उसे लाभ दिलाया है। हमने सभी समाजों और वर्गों के विकास की जो राजनीति की है उससे समाज में सामंजस्य बढ़ा है और सभी वर्गों को लाभ मिला है। जिस 27 प्रतिशत आरक्षण न दिलाए जाने के आरोप हम पर लगाए जा रहे हैं, हमने पिछड़े वर्ग के लोगों को उससे भी कई गुना ज्यादा लाभ दिया है। हमें इसके लिए किसी अग्निपरीक्षा देने की जरूरत नहीं है। उन्होंने सदन के नेता के रूप में कहा कि हमने जाति धर्म की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर जनहित को सर्वोपरि रखा है। जिस तरह कमलनाथ कांग्रेस की टीम वैमनस्य फैलाने की राजनीति कर रही है हम उसका जवाब देने में सक्षम हैं। सरकार के रुख ने कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं के सामने घिरे असमंजस को भी दूर कर दिया है और जनता में फैलाए जा रहे भ्रम को भी हटा दिया है। कांग्रेस के इस वार ने सरकार को समय से पहले सावधान कर दिया है कि वह कांग्रेस की इस वैमनस्य फैलाने वाली राजनीति के लिए भी भविष्य में तैयार रहे।